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Tuesday, 17 March 2020

युवा पीढ़ी को स्वामी जी का संदेश(Swamiji's message to the younger generation) part 2


अपने इतिहास को जानो


अतीत से ही भविष्य बनता है । अत: यथासंभव अतीत की ओर देखो , पीछे जो चिरंतन निर्जर बन रहा है, भरपेट उसका जल पिओ और उसके बाद सामने देखो और भारत को उज्जवलतर महत्तर और पहले से अधिक ऊंचा उठाओ ।........ हमारे पूर्वज महान थे। हम भारत के गौरवशाली अतीत का जितना ही अध्ययन करेंगे, हमारा भविष्य उतना ही उज्जवल होगा। हमारे पीछे परंपरागत संस्कार और हजारों वर्षों के सत - कर्म है , उन्हीं से संबल प्राप्त कर वर्तमान सामाजिक व्यवस्था और भी सुदृढ़ बन सकेगी । हमारे उपनिषदों, पुराणों और अन्य सब शास्त्रों में जो अपूर्व सत्य छिपे हुए हैं , उन्हें इन ग्रंथों के पन्नों से बाहर निकालकर , मठों की चारदीवारीयां भेदकर  वनों की निर्जनता से निकालकर , कुछ विशेष संप्रदायों के हाथ से छीन कर देश में सर्वत्र बिखेर देना होगा , महापुरुषों के त्याग , निष्ठाथा धैर्य के आदर्श सामने लाना होगा , ताकि नई पीढ़ी उससे सीख लेकर आगे बढ़ सके ।

शिक्षा हमारी मूलभूत आवश्यकता



स्वामी विवेकानंद ने कहा है - "जिस राष्ट्र की जनता में विद्या - बुद्धि का जितना ही अधिक प्रचार है, वह राष्ट्र उतना ही उन्नत है। भारत के सर्वनाश का मुख्य कारण यही है कि देश की सारी विद्या बुद्धि , राज्,- शासन और दंभ के बल पर मुट्ठी भर लोगों के एकाधिकार में रखी गई । यदि हमें फिर से उन्नति करनी है, तो हमको उसी मार्ग पर चलना होगा, अर्थात जनता में विद्या का प्रसार करना होगा।" भारत के लोगों को यदि आत्मनिर्भर बनने की शिक्षा न दी जाए, तो सारे संसार की दौलत से भारत के एक छोटे से गांव की भी सहायता नहीं की जा सकती हैं । नैतिक तथा बौद्धिक - दोनों ही प्रकार की शिक्षा प्रदान करना हमारा पहला कार्य होगा चाहिए । हर राष्ट्र, हर पुरुष और स्त्री को अपना उद्धार स्वयं करना होगा। उन्हें विचार दे दो - बस, बाकी सब वे स्वयं कर लेंगे । भारत में बस यही करना है।

चाहिए सच्चे देश भक्तों की टोली



जिस राष्ट्र ने अतीत में हमारे लिए जितने इतने बड़े-बड़े काम किए हैं , उसे प्राणों से भी प्यारा समझो ।.........  क्या तुम यह अनुभव करते हो कि अज्ञान के काले बादल ने सारे भारत को ढक लिया है ? यह सोचकर क्या तुमको बेचैनी  होती है ? क्या इस सोच ने तुम्हारी निद्रा छीन ली है कि भारत के लोग दुखी हैं? यदि 'हां' तो फिर तुम देशभक्त बनने की पहली सीढी पार कर गए हो । यदि तुमने केवल व्यर्थ की बातों में शक्ति क्षय न करके, इस दुर्दशा के निवारण हेतु कोई यथार्थ कर्तव्य - पथ निश्चित किया है , स्व देशवासियों को इस जीवनमृत दशा से बाहर निकालने - उनके दुखों को कम करने के लिए दो सांत्वनादायक शब्दों को खोज लिया है , तो यह तो दूसरी सीढ़ी है । और यदि तुम पर्वताकार  विध्न - बाधाओं को लांघकर राष्ट्रकार्य करने के लिए तैयार हो, सारी दुनिया विरोध में खड़ी हो जाए तो भी निर्डरता से सत्य की रक्षा के लिए खड़े रहने और संगी साथियों के छोड़ जाने पर भी यदि तुम राष्ट्रोंत्थान के अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहोगे , तो यह तीसरी सीढी है।
देशभक्त बनो, जिस राष्ट्र ने अतीत में हमारे लिए इतने बड़े-बड़े काम किए हैं, उसे प्राणों से भी प्यारा समझो ।.......... भारत तभी जागेगा, जब विशाल हृदयवाले सैकड़ों स्त्री-पुरुष भोग - विलास और सुख की सभी इच्छाओं को विसर्जित कर मन , वचन और शरीर से उन करोड़ों भारतवासियों के हित के लिए सचेष्ट होंगे जो दरिद्रता तथा मूर्खता के अज्ञात सागर में निरंतर डूबते जा रहे हैं ।

भागो मत ,सामना करो



ओ राष्ट्रयोद्धा! जागो और सपने देखना बंद करो । मृत्यु तुम्हें भी पकड़ ही लेगी........तब तक डरो मत। रणक्षेत्र से दूर भागना यह मैंने कभी नहीं किया है , तो क्या अब ऐसा होगा? क्या हारने के डर से मैं मुकाबला छोड़ दूंगा?....... जब में मुकाबला करता हूं तो सिंह की तरह, कमर कसकर मैं समझता हूं कि वही व्यक्ति हीरो है, वरन भगवान है जो यह कहता है- 'परवाह मत करो  निडर बनो। हे वीर, मैं तुम्हारे साथ हूं । ऐसे ईश्वरीय पुरुष को मैं हजारों बार प्रणाम करता हूं । उनकी उपस्थिति ही संसार को पवित्र बनाती है। वे ही संसार के रक्षक हैं । दूसरी और जो लोग सदैव यही विलाप करते हैं - 'आगे मत जाओ , वहां यह खतरा है , वहां वो खतरा है , वे हमेशा डर से कांपते रहते हैं । ऐसे लोग कृपा के पात्र हैं । वे कभी भी कुछ हासिल नहीं कर सकते ।"
चुनौतियों से भागो मत उनका सामना करो। अहिंसा जैसे सिद्धांतों के बहाने डरपोक मत बनो , स्वाभिमानी बनो। डर जाने से आगे बढ़ने का मार्ग अवरुद्ध होता है और हम अपनी असफलताओं के लिए दूत्कारे जाकर पीछे धकेल दिए जाते हैं । इन सब के पीछे हैं - आत्मविश्वास और आत्मसम्मान की कमी । 

पूर्ण एकाग्रता से लक्ष्य साधो



मैं कई बार प्रश्न करता था कि यदि हममें कार्य के प्रति उत्तेजना नहीं है तो फिर हम कार्य को कैसे पूरा कर सकेंगे । ऐसा में  पूर्व के कुछ वर्षों से सोचता था, किंतु जैसे - जैसे मुझे अनुभव प्राप्त हुए मैंने जाना कि यह सत्य नहीं है। उत्तेजना जितनी कम होगी हम उतने बेहतर ढंग से कार्य सकेंगे । हम जितने शांत होंगे , उतना बेहतर और अधिक कार्य हम कर सकेंगे । जब भी हम भावनात्मक रूप से कमजोर होते हैं, अपनी उर्जा को बर्बाद करते हैं , अपनी हिम्मत को तोड़ते हैं, मस्तिष्क को बाधित करते हैं और हम इस कारण बहुत थोड़ा कार्य ही कर पाते हैं। कार्य को संपन्न करने के लिए आवश्यक ऊर्जा को हम नगण्य व मामूली भावनाओं में गवा देते हैं । लक्षित कार्य तभी होगा जब मस्तिष्क शांत हो और सारी ऊर्जा केवल कार्य को पूरा करने में एकत्र हो। यदि तुम विश्व के प्रमुख महान व्यक्तियों की जीवनी पढ़ो तो तुम्हें ज्ञात होगा कि वे सब आश्चर्यजनक रूप से शांत प्रकृति के थे । कहीं भी , कुछ भी उन्हें असंतुलित नहीं कर पाता था । इसलिए एक व्यक्ति जो शीघ्र क्रोधित होता है,वह कोई भी बड़ा कार्य नहीं कर पाता और वह व्यक्ति जिसे कोई भी बात क्रोधित / विचलित नहीं करती वह कार्य को सफलतापूर्वक पूरा कर लेता है । एक व्यक्ति जो स्वयं को क्रोध , उत्तेजना या द्वेष - घृणा के मार्ग पर डाल देता है , कोई कार्य नहीं कर सकता , वह केवल स्वयं को टुकड़ों में बांटता है।


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