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Saturday, 14 March 2020

उदार बनो : सेवा करो ( Be generous: serve)

स्वामी विवेकानंद द्वारा लिखा गया सफलता का दसवां व अंतिम सूत्र
स्वामी विवेकानंद का यह संदेश, मन और मस्तिष्क की अंतर्द्वंद  की स्थिति में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा क्योंकि वे कहते हैं "जब कभी मन (अंतः करण) और मस्तिष्क (चेतना बुद्धि) में अंतर्द्वंद हो तो मन का अनुसरण करो। यह कल हृदय ही है , जो किसी को भी उन सर्वोच्च ऊंचाई तक ले जा सकता है। दूसरों के लिए किया गया कर्म ही मन को संतोष देता है । जीवन में सुखी, शांत और संतुष्ट रहना है तो उदार बनो और जरूरतमंदों की सेवा करो । पीड़ित मानवता की सेवा हमेशा हमें शांत , सज्जन और सुखी बना सकती है । जीवन में दूसरों की सेवा एक ऐसा प्रकल्प है जिससे व्यक्ति के रूप में द्वेष, ईर्ष्या  या दुर्भावना और बेर का हास होता है।



स्वामी विवेकानंद सच्चे कर्मयोगी थे । उन्होंने गरीबों के दुख दूर करने के विशेष प्रयोजन के लिए जन्म लिया था और इसका उन्होंने अंतिम श्वास तक अनवरत निर्वहन भी किया । वे कहते हैं  "नर सेवा ही नारायण सेवा है"। ईश्वर से साक्षात्कार  प्रत्येक मनुष्य के जीवन में संभव नहीं, किंतु यदि कोई मनुष्य पीड़ित मानव की मन पूर्वक सेवा का कार्य करता है तो उसे ईश्वर दर्शन के सुख- संतोष की सहज प्राप्ति हो जाएगी।  पीड़ित मानव की सेवा ही, ईश्वर की सच्ची आराधना है। निस्वार्थ भाव से दूसरों के लिए किया गया कार्य तन और मन दोनों को पवित्र करता है और मनुष्य को ईश्वर के निकट लाता है । मन की पवित्रता ही शांति और आनंद देती है । शांति और आनंदपूर्वक ही हम जीवन के लक्ष्य को सफलतापूर्वक प्राप्त कर सकते हैं । इस भौतिक युग में जीविकोपार्जन के लिए हम जितने भी व्यस्त हो , कहीं कुछ समय पीड़ित मानव की सेवा के लिए अवश्य निकालें । जीवन- पथ पर तभी हमको असीम आत्मिक सुख प्राप्त हो सकेगा। सत् लक्ष्य की प्राप्ति के लिए यह एक महत्वपूर्ण कारगर सूत्र है- ' उदार बनो  और पीड़ित मानव की सेवा करो ।'

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