E-mail subscription

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

Wednesday, 11 March 2020

दुर्बल नहीं, सबल बनो ( Not weak be strong)

स्वामी विवेकानन्द जी द्वारा लिखा गया सफलता का पांचवा सूत्र 



स्वामी जी कहते हैं - " शक्ति, शक्ति, शक्ति " , यही वह जिसकी हमें जीवन में सर्वाधिक आवश्यकता है।" कमजोर के लिए कोई जगह नहीं है, ना इस जीवन में , और ना ही किसी और जीवन में ।


यह महान सत्य है - 'शक्ति ही जीवन है और दुर्बलता मृत्यु।' इसलिए 'दुर्बल नहीं , सबल बनो।' युवाओं को यदि जीवन में शिखर की ओर आगे बढ़ने की लालसा है, बड़े लक्ष्य को चुनने और पाने की दृढ़ इच्छा है, तो फिर पहले उन्हें शक्तिमान बनना होगा।  सशक्त - प्रभावी व्यक्तित्व के लिए शारीरिक शक्ति, बौद्धिक शक्ति और नैतिक शक्ति को समाहित करने वाली समग्र शक्ति की आवश्यकता है। शारीरिक शक्ति पोष्टिक भोजन, नियमित योग व  खेल अभ्यासो से,  बौद्धिक शक्ति जागरूकता, गहन अध्ययन में सार्थक - सकारात्मक विचारों से, तथा नैतिक शिक्षा चरित्र, वाणी व कर्म में पवित्रता से प्राप्त की जा सकती है। स्वयं को दुर्बल समझना सबसे बडा पाप है ।  अपनी क्षमताओं को पहचानो,  उन्हें  जागृत करो और बलशाली बनकर  जीवन संघर्षों का सामना करते हुए लक्ष्य को प्राप्त करो ।।


'  सशक्त शरीर में ही सशक्त मन रहता है ।' इसलिए शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार से सशक्त बनने की आवश्यकता है । नैतिक बल शक्ति को दुगना बढ़ा देता है । भारत में विश्व के सर्वाधिक युवा हैं । जिस देश के बाद युवा - शक्ति की ऐसी विपुल संपदा हो,  उसे उन्नति के शिखर तक जाने से कोई नहीं रोक सकता । किंतु जैसा स्वामी विवेकानंद ने कहा है कि सर्वप्रथम भारत के युवा को शक्तिशाली बनना होगा। शारीरिक बौद्धिक और नैतिक बल से युक्त सामर्थ्य प्राप्त करना होगा ! लक्ष्य के प्रति सजक रहकर आगे बढ़ते हुए निराशा और दुर्बलता के भाव को निकट नहीं आने देना है ! पिछली उपलब्धियों से ऊर्जा उत्साह प्राप्त कर  मंजिल तक पहुंचना है। देश का युवा वर्ग शक्तिशाली होगा तो राष्ट्र भी शक्तिशाली बनेगा और उन्नति के शीर्ष पर पहुंचेगा ।


          6. आत्मविश्वास को दृढ़ रखो

स्वामी विवेकानंद द्वारा लिखा गया सफलता का छठा सूत्र


स्वामी विवेकानंद कहते हैं - "कोई कुछ भी कहे, अपने विश्वास में दृढ़ रहो दुनिया तुम्हारे पैरों तले आ जाएगी । अपने आप पर विश्वास करो , सब शक्ति तुम में है,  इसे जान लो और प्रकट करो।" स्वामी विवेकानंद कहते हैं -" विश्व का इतिहास केवल ऐसे कुछ महापुरुषों का इतिहास है , जिनको स्वयं में विश्वास था।  किसी भी मनुष्य को महान बनाने के पीछे एक मात्र शक्ति है-  आत्मविश्वास । विश्वास, विश्वास स्वयं में विश्वास, महता का यही रहस्य है । यदि तुम्हें 33 करोड़ देवता पर विश्वास है, किंतु स्वयं पर विश्वास नहीं है , तो तुमको कभी भी मोक्ष की प्राप्ति नहीं होगी।" वे अपने शिष्यों से कहा करते थे - "मैं पूरे जीवन भर यंत्रणाओ और बाधाओं में झोंका गया हूं । अनेकों उपवासो  के कारण मैंने मृत्यु को अति निकट से देखा है। तिरस्कृत और उपेक्षितो की भांति मुझे उपहास व अविश्वास का कष्ट झेलना पड़ा;  किंतु मेरे बच्चों ! यह दुखों का संसार है,  और यही वह संसार भी है जहां महान आत्माओं और पैगंबरो ने सवेतना -  सहानुभूति , धैर्य तथा इन सबसे ऊपर आत्मविश्वास की अदम्य शक्ति का परिचय कराया। आत्मविश्वास को  दृढ़ करो ,  फिर तुम्हारे दुख और बाधाएं स्वत: ही दूर होते जाएंगे।" आत्म विश्वास - सफलता का मूलभूत तत्व है । इसके द्वारा जीवन की उन्नति और सफलता सुनिश्चित है ।

  

No comments:

Post a Comment