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Monday, 30 March 2020

मूल्यों की शिक्षा ( Values ​​education )


आज देश में भ्रष्टाचार , अनाचार , दुराचार , हिंसा लूट एवं आत्महत्याएं , आदि समस्याओं में बहुत तेजी से बढ़ोतरी हो रही है, जिससे हम चिंतित अवश्य हैं लेकिन इसके समाधान का रास्ता नहीं दिख रहा है ।
समाधान के दो प्रकार हैं । एक तात्कालिक इन सारी बातों को रोकने का प्रयास जिस की चर्चा बड़ी मात्रा में समाचार माध्यमों एवम् लोगों में हो रही है । जैसे कानून - व्यवस्था ठीक से हो इस हेतु  सरकार के द्वारा पुलिस की पर्याप्त व्यवस्था हो, कानून और कड़े किए जाए । पुलिस - प्रशासन अपना दायित्व ठीक से निभाये इस प्रकार की अपेक्षाएं की जाती है और यह आवश्यक भी है। लेकिन देश का अधिकतर बौद्धिक वर्ग एवं नेतृत्व स्थाई समाधान हेतु विचार नहीं कर रहे हैं । किसी भी समस्या के स्थाई समाधान का विचार करना है तब सबसे प्रथम इसके कारण में जाने की आवश्यकता रहती है । ये समस्याएं , वास्तविकता में तो परिणाम है कारण कुछ और है ।


इसका प्रमुख कारण देश की वर्तमान शिक्षा व्यवस्था है । देश की शिक्षा में संस्कार , चरित्र निर्माण , नैतिकता , आध्यात्मिकता एवं मूल्यों की बात नहीं  होगी तब परिणाम क्या होगा ? समग्र विश्व भी इसी प्रकार की समस्याओं से जूझ रहा है। जिन देशों में आर्थिक , भौतिक संपदा है , विज्ञान - तकनीकी का भी अच्छी मात्रा में विकास हुआ है ।  इसमें से अनेक देशों में अनुशासन , नागरिक कर्तव्यपालन , (सिविक सेंस), राष्ट्रभावना , कर्मठता आदि बातें होने के बाद भी वहां सुख - शांति नहीं है । श्री महर्षि अरविंद ने कहा है कि - "जब से देश की शिक्षा का जीवन - मूल्यों से  विछोह हो गया  तब से देश के लोग धर्मभ्रष्ट - लक्ष्यभ्रष्ट हो गए ।"

देश के सभी आधुनिक महापुरुषों ने भी शिक्षा में जीवन - मूल्यों की आवश्यकता का अनुभव किया है । हमारे सारे पंथ - संप्रदाय के महापुरुषों ने विभिन्न धार्मिक ग्रंथों में इसका जिक्र किया है। स्वतंत्र भारत के सारे आयोग ने भी मूल्य - शिक्षा की वकालत की है; लेकिन आज तक सरकार द्वारा चलाई जा रही औपचारिक शिक्षा व्यवस्था में इसका समावेश नहीं किया गया । निजी स्तर पर कुछ  शैक्षिक , सामाजिक ,आध्यात्मिक संस्थाओं के द्वारा नैतिक , आध्यात्मिक ,धार्मिक जीवन - विद्या , मानव - मूल्य एवं जीवन - मूल्य आदि शीर्षक के तहत इसको शिक्षा में सम्मिलित करने का प्रयास किया जा रहा है  । इस सभी का तात्पर्य लगभग समान है परंतु इसका परिणाम प्राय नहीं है। इस हेतु देश की समग्र शिक्षा मूल्य आधारित बने यह सर्वोच्च प्राथमिकता का विषय बनना चाहिए  ।
मूल्य का अर्थ
(Meaning of value)

👉 मूल्य शब्द धातुरूप मूल से बना होने के कारण इसका अर्थ जो मूल में , जड़ में है ,जो बीजरूप वृक्ष में विद्यमान है , जो मूलभूत आधारभूत तत्व है ।
👉 जिसमें आदर्श और पुरुषार्थ है , जिसमें मानव जीवन का संपूर्ण विकास हो सके ।
👉 मूल्य के अंतर्गत सभी गुण समाविष्ट होने चाहिए जिसका संबंध आंतरिक (आत्मनेपद) बाइए (परस्मैपद) और एक साथ दोनों से उदयपद !


शिक्षा का अर्थ
(Meaning of education)

शिक्षा के उद्देश्य के संदर्भ में ऋग्वेद में कहां है 
"असतो मा सदगमय , तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मामृतंगमय"  (असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर, मृत्यु से अमरत्व की ओर ले जाए) दूसरे शब्दों में कह टो "सा विद्या या विमुक्तये" विद्या (शिक्षा) वह है जो व्यक्ति के जीवन को प्रत्येक बंधन से मुक्ति दिला सके । शिक्षा के लक्ष्य और जीवन के लक्ष्य में कोई अंतर नहीं होना चाहिए । उपयुक्त कथन से कुछ लोगों के मन में भ्रम होता है कि हम शिक्षा में  मात्र आध्यात्मिकता की बात करते हैं; परंतु यह गलत धारणा है । हमारा मूल आध्यात्मिकता अवश्य है लेकिन अपने यहां धर्म और मोक्ष के साथ अर्थ और काम ऐसे चार पुरुषार्थ की बात कही है। अर्थ और काम का महत्व अपने यहां कभी कम नहीं माना गया है परंतु अर्थ और काम धर्म आधारित हो यह सोच ही मूल्यों को प्रतिबंधित करती है। अगर भारत भौतिक दृष्टि से संपन्न नहीं होता तो विदेशी आक्रमक लूट के लिए भारत में क्यों आते ? हमारे यहां आध्यात्मिकता एवम् भौतिकता दोनों का संतुलित दृष्टिकोण था। इस दृष्टिकोण को आधुनिक शब्दों में "एजुकेशन फॉर लिविंग एंड लाइफ" कहा है । अर्थात शिक्षा से जीवन जीने का दृष्टिकोण एवं जीवन निर्वाह हेतु आवश्यक क्षमता निर्माण होना चाहिए ।

इस दृष्टिकोण से देश की शिक्षा का स्वरूप हमारी संस्कृति , प्रकृति एवं प्रगति के अनुरूप बने। शिक्षा से अभिप्रेत है - व्यक्तित्व का समग्र विकास एवं चरित्र निर्माण , देश एवं समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति तथा राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों का समाधान हो । शिक्षा की इस संकल्पना को साकार करने हेतु शिक्षा में मूल्यों का समावेश अनिवार्य है ।

👉 भारतीय जीवन मूल्यों को समझने की मुख्यतः तीन दृष्टिया हो सकती है ।

1. दार्शनिक आधार ।
2. सामाजिक चेतना ।
3. वैयक्तीक चरित्र व आचरण ।

👉 गुरुवाणी में कहा गया है कि "सच सबसे ऊपर है यदि उससे ऊपर कुछ है तो वह सच का आचरण।"

👉 "गुरुनानक" 
__कीरत करो , नामजपो, बं छको अर्थात 'संगत, पंगत और लंगर' के दर्शन का प्रतिपादन करते हुए सामाजिक समरसता का प्रचार किया ।
👉 उपनिषद के तीन द 'द - द - द' स्वर हमें दमन, दान, दया को जीवन मूल्यों के रूप में अपनाने की शिक्षा देता है ।

👉 जैन दर्शन
__जैन दर्शन में सत्य , अहिंसा , अस्तेय , अपरिग्रह एवं ब्रह्मचर्य  मूल्यों पर बल दिया गया है ।
__जो अपना नहीं है उसे प्राप्त करने की इच्छा भी चोरी है ।

👉 श्रीमदभागवत में तो कहां है - अपने जीवन निर्वाह की आवश्यकता से अधिक जो अपने पास रखता है अर्थात दान नहीं करता  वह - चोरी के धन का ही उपयोग करता है ।

👉 स्वामी विवेकानंद
"पत्थर की मांसपेशियां और फौलाद के भुजदंड" मन से छिछली भावुकता के प्रवाह को निरुद्ध करने में समर्थ और बुद्धि से विभिन्न प्रकार की शिक्षा- कला तथा वैज्ञानिक विद्याओं को आत्मसात करने को तत्पर विद्यार्थी - जीवन में इन गुणों के विकास के लिए ही ब्रह्मचर्य को जीवन - मूल्यों के रूप में अपनाने की आवश्यकता को रेखांकित किया गया था ।
  
if  wealth is lost nothing is lost
If health is lost something is lost
but character is lost everything is lost




👉 छात्रों व शिक्षकों द्वारा स्वमूल्यांकन

__ सतत निरीक्षण से
__अभिभावकों से संपर्क करके
__ अन्य अभिरुचियों से
__ समूह में कार्य के अवलोकन से
__ वार्तालाप से
__ लिखित परीक्षा से
__ दायित्व प्रदान कर परिणामों को आंकने से
__ विशेष परिस्थिति निर्माण कर उसके व्यवहार को देखने से
__ प्रकृति - प्रकोप तथा अन्य आंतरिक , बाह्य कष्ट की घड़ी में उसकी सहभागिता से
__ खेलकूद की रोटियों से
__ पुस्तकालय से लेकर जाने वाली पुस्तकों से
__ अन्य सभी आचार्यों , सहपाठियों के अभिमत से आदि ।



"अगर किसी देश को भ्रष्टाचार मुक्त और सुंदर मन वाले लोगों का देश बनाना है तो , मेरा दृढ़ता पूर्वक मानना है कि समाज के तीन प्रमुख सदस्य ये कर सकते हैं, माता-पिता और गुरु ।"

                            
                    __    डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम



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