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Tuesday, 31 March 2020

नैतिक मूल्यों की स्थापना कैसे ?(How to establish moral values?)





नैतिक मूल्य या जीवन मूल्य आज पुनः सर्वाधिक चर्चा का विषय  बना है। क्यों? दुर्भाग्य से भारत एक वैचारिक दुंदू की अवस्था में है और इसका केंद्र तथाकथित विकसित देशों में है। आज आधुनिकता की परिभाषा बदल गई है । आधुनिक का तात्पर्य देश - काल परिस्थिति के अनुसार भाष्यकर युगानुकुल  की स्वीकृति नहीं है । आज जो पाश्चात्य विशेषकर वाया अमेरिका आता है वह आधुनिक है, ऐसी मान्यता स्थापित करने का प्रयत्न सुनियोजित तरीके से नव वामपंथ वे तथाकथित सेकुलरो ने, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किया और उसमें भी आंशिक सफल होते हुए भी दिखाई देते हैं । ऐसी स्थिति में हमें नैतिक मूल्यों की भारतीय अवधारणा, प्रांसगीकता व इसकी उन्हें पुनस्थापना की कार्ययोजना पर विचार विमर्श कर समाज का मन बनाने की आवश्यकता है ।


नैतिक मूल्यों की आवश्यकता

आज आधुनिकता के नाम पर "लिव इन रिलेशन" की बात करते हैं तो पशु पक्षियों पक्षियों में तो यह नैसर्गिक है । कुछ अंग ढकने के लिए बने कपड़ों को कुछ रंग दिखाने के लिए छोटे करना ही और इस पर टिप्पणी के विरोध में "स्लटवॉक"करना है यदि आधुनिकता है तो जंगली अवस्था में मनुष्य नंगा ही घूमता था । आज भी कई वनवासी जातियां इसी अवस्था में है । फिर मनुष्य जंगल से बाहर क्यों आया ? यदि सड़कों पर,  Kiss of love के आयोजन आधुनिकता है तो घरों में शयनकक्ष बनाने की कल्पना मनुष्य ने क्यों की ?

यह सब कहने का तात्पर्य यह है कि आदमी अवस्था में मनुष्य जो स्वच्छंद तरीके से करता था, उससे मैं संतुष्ट नहीं था और इसलिए जंगल से बाहर आकर समाज बनाने की कल्पना उसने की । एक से दो व्यक्ति होते ही व्यवहार के कुछ नियम तय करने पड़ते हैं । समाज ने भी स्वेच्छा स्वीकार कर उसके अनुरूप जीवन यापन के लिए कुछ नियम बनाए और जो शाश्वत जीवन मूल्य कहलाते हैं । इसकी साधना बाध्यता नहीं है; किंतु अपेक्षा है  और जो इज्जत सीमा तक इसको जीवन में साकार करता है उसके अनुरूप ऋषि से देव तक श्रेणियां बन गई - इन्हीं शाश्वत जीवन - मूल्यों को भारत में धर्म कहा गया है ।
इसी प्रकार कुछ नियम बाध्यता की सीमा तक जाते हैं । इनका पालन न करने पर दंड विधान होता है । इन्हें नीति या विधान कहते हैं । इस प्रकार हम कह सकते हैं कि कुछ स्वयं स्वीकृत नियम होते हैं जिनका पालन मनुष्य को नर से नारायण बनाता है तथा कुछ शासन द्वारा निर्धारित नियम होते हैं जिनसे समाज व्यवस्था का नियमन होता है । कोई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर या आधुनिकता की झोंक में इनके उल्लंघन का प्रयत्न करता है तो इससे अराजकता व अनैतिकता  उत्पन्न होगी और समाज - धारणा विच्छेद हो जाएगी ।


नैतिक मूल्यों की स्थापना की
आयाम

समय के साथ समाज - परिवर्तन एवं  तदनुरूप व्यवस्था परिवर्तन होता है । इन दोनों में संतुलन सफल समाज व राष्ट्र का घोतक होता है । समाज में आमूल - चूल परिवर्तन नहीं होता। समाज जीवनमान इकाई है अतः प्राणी की वृद्धि एवम् विकास की तरह समाज में भी परिवर्तन मूलधुरी अधिष्ठान स्थान पर ही होता है ।


पतझड़ आने पर झड़ जाते
पल्लव जो पीले पड़ जाते हैं ।
वे पुरातन कह कभी ना अड़ते
नव किसलय तब सरसाते हैं ।।

पर मूल पुरातन होने पर भी
कब वृक्ष उसे तज पाता है ।
धुरी सनातन पर हो तो सब,
नूतन परिवर्तन होता है ।


(क) आनुवंशिकता :- जैसे सजीव प्राणी में पीढ़ी दर पीढ़ी संतति में गुणों के संचरण के संबंध में अनुवांशिक नियम होते हैं उसी प्रकार समाज व राष्ट्र की भी एक सनातन चिति होती है जिसे संस्कृति कहते हैं । इस संस्कृति से समाज का DNA बनता है । भारत के नैतिक मूल्य इसी परंपरा से विकसित हुए हैं । धर्म के 10 लक्षण, पंचशील का सिद्धांत, कर्म की अवधारणा, पुरुषार्थ की परिकल्पना, सोलह संस्कारों की भावना, आश्रम व्यवस्था, परिवार व कुटुंब की संकल्पना, विश्व को आर्य बनाने की कामना-  ये हमारे मूलाधार हैं जिन पर हमें अपने जीवन मूल्यों का भव्य प्रासाद खड़ा करना है । अतः हमारे सब नीति - नियम, पाठ्यक्रम, सह शैक्षिक गतिविधियां , हमारा साहित्य, कला, व्यवहार इसी से निर्धारित होता होना चाहिए !   इसके लिए निषेध लादने की आवश्यकता नहीं , विद्यायी बातों के लिए मन बनाने की व्यवस्था, आवश्यकता है ।


(ख) परिवेश:- समाज व व्यक्ति के श्रेष्ठ सिद्धांत भी गौण हो जाते हैं जब उन्हें पल्लवन- पुष्पन के लिए अनुकूल वातावरण नहीं मिलता। हजारों वर्षों के अनुभव के पश्चात भारत ने कुछ श्रेष्ठ परंपराएं स्थापित की थी । प्राचीन भारत में शिक्षा' नामक पुस्तक में हार्टमट शार्फे लिखते हैं "प्राणी जगत में वातावरण ीय कारकों तथा डार्विन के चयन सिद्धांत के अनुसार शारीरिक एवं बौद्धिक लक्षण संतति  में  संचारीत होते हैं । मनुष्य में बहूतांश में यह प्रक्रिया विचारपूर्वक होती है; किंतु मानव इतिहास में यह व्यक्तिगत प्रयत्न की तुलना में सर्वाधिक समाज के सामूहिक चैतन्य से संभव हुआ है । इस प्रकार सामूहिक शिक्षा ने  यद्यपि वैयक्तिक व्यवस्था में लाखों परिवर्तनों के माध्यम से भाषिक एवं प्रशासनिक सीमाओं तथा भौगोलिक बताओ जैसे विशाल नदियां, पर्वत श्रेणियां, मरुस्थलो एवं सघन वनों के पार भारत की सांस्कृतिक एकता का सृजन किया । "

अतः भारत का परिवेश पुनः नीति और धर्मयुक्त बनाना प्राथमिकता है । इसके लिए चार स्तरों पर कार्य करने की आवश्यकता है:- परिवार, विद्यालय, समाज व विश्व । इन चारों की क्रमबद्ध यात्रा से ही "वसुदेव कुटुंबकम" का स्वप्न साकार हो सकता है। सर्व स्थानों पर भोगवादी वातावरण को समाप्त करने के लिए देविय वातावरण का विस्तार आवश्यक है । नकारात्मक बातों से ऋणआत्मक उर्जा प्रसारित होती है और व्यक्ति में आत्म ग्लानि व हतोत्साह की मनोवृति उत्पन्न होती है । समाज में होने वाले छोटे-छोटे "अणुव्रतों" को प्रोत्साहन तथा प्रेरणा से सत्कर्म की प्रवृत्ति निर्मित होती है । ऐसा परिवेश बनाने के लिए संगठित पहल की आवश्यकता है ।



(ग) पुरुषार्थ:- समाज की सैद्धांतिक उच्च अवधारणाओं तथा अनुकूल परिवेश के उपरांत भी व्यक्ति स्वयं परिवर्तन के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ नहीं होता तो परिणाम नहीं आता। जीवन मूल्यों की साधना व्यक्तिगत है प्रकटीकरण  सार्वजनिक है और निर्मित वातावरण सामाजिक है । व्यक्तिगत साधना के लिए संकल्प की आवश्यकता होती है तथा संकल्प से च्युत न हो व संकल्प पुष्ठ हो इसके लिए सकारात्मक परिवेश की आवश्यकता होती है । अतः नैतिक मूल्य निर्माण के यह आयाम अन्योंयाश्रीत है ।


नैतिक मूल्यों की स्थापना कैसे :- प्रारब्ध, परिवेश और पुरुषार्थ की त्रियुती के संलयन की भट्टी कौनसी है ? अब तक के प्रयत्नों में सर्वाधिक चर्चा नैतिक शिक्षा के पाठ्यक्रम की होती है । निश्चित तौर पर इसका महत्व है किंतु पढ़ाने वाला शिक्षक अनैतिक हो तो ? विद्यार्थी जिस परिवार से आ रहा है उसका वातावरण भोगवादी, आसुरी हो तो जिस प्रशासनिक तंत्र का यह सब हिस्सा है, वही भ्रष्ट हो तो ? इसलिए नैतिक मूल्यों की स्थापना हेतु आवश्यक "नैतिक शिक्षा" की संकल्पना बहु आयामी है । अभिभावक, बालक शिक्षक व प्रशासनिक तंत्र के चतुर्भुज स्वरूप को उपयुक्त तीन आयामों:- प्रारब्ध, परिवेश व पुरुषार्थ  के कुशल संयोजक से पुष्ट करने की दीर्घकालिक योजना पर कार्य करने की आवश्यकता है । इनमें से सबसे महत्वपूर्ण कड़ी शिक्षक हैं । शिक्षक प्रशिक्षण, चयन, मूल्यांकन की पद्धति पर गहन चिंतन के लिए देशभर में राष्ट्रीय व सकारात्मक सोच वाले अथ्यताओ की कार्यशालाओं करने की आवश्यकता है । इनसे निकलने वाला नवनीत पुन: भारत को आध्यात्मिक एवं नैतिक संपदा से युक्त परम वैभव की ओर ले जाने वाला सिद्ध होगा, ऐसा लगता है ।



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