प्रस्तुत विषय को देखकर सर्वप्रथम तो हर्ष की अनुभूति हुई कि आज जब भारत का युवा पश्चिमी जीवनशैली के अंधानूकरण की दौड़ में शामिल हो रहा है और हमारे नैतिक एवं सामाजिक मूल्यों से विचलन का दौर चल रहा है, उस समय इस ज्वलंत विषय पर चिंतन की समझ तो उत्पन्न हुई ।
प्रस्तुत विषय में तीन शब्दों, मानव व मूल्य को जान लें तो विषय कि महत्ता स्वत: स्पष्ट हो जाएगी । शिक्षा शब्द संस्कृत की 'शिक्षविधोपादाने' धातु से निष्पन हुआ है, जिसका तात्पर्य है, विद्या ग्रहण करना। विद्या शब्द भी संस्कृत की 'विद' धातु से बना है और इस धातु के अनेक अर्थ यथा = ज्ञान, चेतना, आख्यान, निवास, विचारना, वेदना, परिवाद, सता, लाभ आदि प्राप्त होते हैं। इन अर्थो से शिक्षा का क्रमश: ज्ञानशक्ती, न्यूनताओं का आकलन, आत्मावलोकन, विभिन्न प्रकार ( यथा - सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक, आध्यात्मिक आदि) के लाभ आदि से संबंध स्वत: स्पष्ट हो जाता हैं। इस प्रकार शिक्षा का दायरा किसी के पूरे जीवन को अपने में समेटे हुए हैं।
इसका तात्पर्य यह है कि जब प्राणी गर्भ में आता है, तभी से उसका शिक्षणकाल प्रारंभ हो जाता है।
अभिमन्यु का गर्भ में चक्रव्यूह भेदन सीख लेना इस सत्य का महाभारत उदाहरण है तो क्लेश की अवस्था में गर्भस्थ शिशु का एक और सिकुड़ कर पड़ जाना सो स्वानुभूत सत्य है। आज के आधुनिक वैज्ञानिक व चिकित्सक भी इस पर बात को प्रमाणित कर चुके हैं कि गर्भवती माता को जिस वातावरण में रखा जाता है, उसका शिशु पर असर पूरा पूरा व आजीवन परीलक्षित होता है। इस प्रकार शिक्षण की यह प्रणाली जन्म से पूर्व व आजीवन चलती रहती है। हम इस रूप में शिक्षा को दो रूपों में विभाजित कर सकते हैं - अनौपचारिक शिक्षा एवं अनौपचारिक शिक्षा । अ
शिक्षा वह जो हम अपने आसपास के वातावरण,अनुवांशिकता आदि से विभिन्न प्रकार के समायोजन के रूप में प्राप्त करते हैं एवं औपचारिक शिक्षा वह हैं जो विद्यालय, महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय आदि के पाठ्यक्रमों द्वारा प्राप्त करते हैं । पुनश्च इस शिक्षा को भी दो भागों में बांट सकते हैं- प्रथम आसुरी शिक्षा एवं दूसरी देवी शिक्षा । संक्षेप में आसुरी शिक्षा वह है जो किसी भी कीमत पर अपना स्वार्थ- संपादन दूसरों को पीड़ित करना आदि सिखाती है और देवी शिक्षा में है जो मानव मूल्य और अथवा धर्म, अर्थ,काम, मोक्ष अपने जीवन में समाहित करना सिखाती है ।
शिक्षा में मानव मूल्यों की जब हम बात करते हैं तो मानव शब्द पर दृष्टि जाती हैं। सामान्य रूप से मानव शब्द - हम आप जैसी मनुष्य सृष्टि का घोतक है! "मनोरपंत्य्य (मनु की संतति) मानव:" अर्थ से यह प्रकट होता है कि हमारी प्रजाति का आदि पुरुष मनु है। इसको यूं भी समझा जा सकता है कि, हमारी प्रजाति का जो भी आदि पुरुष रहा, उसने जीवन को सुगम व सहज तरीके से चलाने के लिए जो नियम, यम इत्यादि बनाए वे हमारे जीवन मूल्य बने अथवा मानव मूल्य बने। कालांतर में जीवनयापन में जब जब भी विसंगतियां आई तो इन जीवन मूल्यों में प्रत्येक देश को प्रत्येक काल में परिष्कार, संशोधन, चिंतन, मनन इत्यादि होते रहें, किंतु मूल रूप मंत्र सब का यही रहा-
सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे संतु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तू मा कश्चित दुःखभाग भवेत्।।
उपयुक्त चिंतन से ही मानव दानव में परिवर्तित होने से बच सकता है, अन्यथा स्वार्थपरायण दृष्टि तो येन केन प्रकारेण यदाचित कदाचित दानवता की ओर धकेलने से बाज नहीं आती ।
जब मूल्य शब्द की ओर दृष्टिपात करते हैं तो, साधारण व्यक्ति इसका अर्थ किसी वस्तु की कीमत से समझता है; किंतु मूल्य शब्द इतना साधारण नहीं है । मूल्य शब्द संस्कृत की चुरादिगणीय मूल रोहणी धातु से बना है । अथवा मूल्य प्रतिष्ठायाम धातु से बना है। दोनों ही अर्थों के अनुसार मूल्य वह तत्व है जिनको जीवन में धारण करने से प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है, जीवन में एक आंतरिक स्थिरता आती है अथवा जीवन परमानंद की ऊंचाइयों को प्राप्त करने में उत्तरोत्तर समर्थ होता जाता है । कोष के अनुसार मूल्य जीवन का आधार या निव है अथवा कपड़े के लिए तंतु या घड़े के लिए मिट्टी के समान जीवन के लिए उपादान कारण है ।
इन तीनों शब्दों का उपयुक्त प्रकार से अर्थ समझ लेने के उपरांत यह प्रश्न उठता है कि वह कौन से मूल्य है, जो जीवन के लिए आवश्यक है अथवा शिक्षा में जिनका समावेश किया जाना चाहिए ? ऋग्वेद के कितव सूक्त में ऋषि जुआरी को शिक्षा देता हुआ कहता है - पासो से जुआ मत खेलो कृषि कर्म करो । इसी प्रकार की अनेक बहुमूल्य शिक्षाओं से वैदिक साहित्य भरा हुआ है । परवर्ती काल में इन्हीं शिक्षाओं का विस्तार होकर धर्मसूत्र साहित्य का निर्माण हुआ । धर्म शब्द का आधुनिक काल के हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, यहूदी इत्यादि अर्थों को भाषित नहीं करता। इनको धर्म कहने के स्थान पर पंथ कहना अधिक उचित है जो एक उस परमात्मा के बताए मुख्य लक्ष्य पर पहुंचने के लिए भिन्न-भिन्न पगडंडियों के समान भिन्न-भिन्न पूजा पद्धतियां हैं । अग्नि का धर्म या कर्तव्य जलाना और प्रकाश उत्पन्न करना है, इस धर्म से वह कभी निष्पक्ष नहीं हो सकता। उसी प्रकार धर्म अर्थात अपने कर्तव्य से कोई भी राज्य या देश या व्यक्ति निरपेक्ष नहीं हो सकता । धर्मनिरपेक्ष राज्य की कल्पना भी जंगलराज का बोध कराती है, हां धर्मनिरपेक्षता के स्थान पर पंथ निरपेक्षता शब्द हो तो वह उचित है ।
धर्म सूत्रों का धर्म शब्द व्यक्ति के कर्तव्यों का निर्देश करता है जिससे उसका वह अन्य सभी का जीवन सुचारु रुप से चल सके । उन धर्मों या कर्तव्यों को हम जीवन मूल्य या मानव मूल्य कह सकते हैं। इन ग्रंथों में अधिकारों के स्थान पर कर्तव्यों को विशेष रूप से प्रस्तुत किया गया है। यदि सभी जन कर्तव्य परायण हो तो अधिकार तो स्वत: ही मिल जाएंगे ।
यह पशुओं का परम सौभाग्य है कि मनुष्य घास नहीं खाता । कवि रहीम ने अधिक बोलने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना सिखाते हुए कहा है -
रहिमन जिहवा बावरी कही गई सरग पताल,
आप तु कही भीतर गई, जूती खात कपाल ।।
वृंद कवि ने 'स्लो एंड स्टेडी विंस द रेस' को अत्यधिक सरल रीति से समझाया है -
धीरे धीरे रे मना धीरे सब कुछ होय।
माली सींचे सो घड़ा ऋतू आए फल होय।।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि शिक्षा में मानव - मूल्यों की सर्वाधिक मेहता है और यह शिक्षा बालक को शिक्षालय ,परिवार, समाज व माता-पिता खेल-खेल में दे सकते हैं ! मानव मूल्य ही मानव को मानव बना देने देंगे अन्यथा उसको दानव बनने से कोई नहीं रोक सकता, ना जेल का भय और न पुलिस का । मानव मूल्यों की शिक्षा देना शिक्षा प्रणाली का परम कर्तव्य है।
"व्यक्ति महान, उत्कृष्ट साहित्य ग्रंथों के अध्ययन से ही अपनी रुचियों को परिष्कृत कर सकता है और अपने आचरण को सभ्य बना सकता है ।"
डॉ. राधाकृष्णन





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