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Tuesday, 31 March 2020

नैतिक मूल्यों की स्थापना कैसे ?(How to establish moral values?)





नैतिक मूल्य या जीवन मूल्य आज पुनः सर्वाधिक चर्चा का विषय  बना है। क्यों? दुर्भाग्य से भारत एक वैचारिक दुंदू की अवस्था में है और इसका केंद्र तथाकथित विकसित देशों में है। आज आधुनिकता की परिभाषा बदल गई है । आधुनिक का तात्पर्य देश - काल परिस्थिति के अनुसार भाष्यकर युगानुकुल  की स्वीकृति नहीं है । आज जो पाश्चात्य विशेषकर वाया अमेरिका आता है वह आधुनिक है, ऐसी मान्यता स्थापित करने का प्रयत्न सुनियोजित तरीके से नव वामपंथ वे तथाकथित सेकुलरो ने, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किया और उसमें भी आंशिक सफल होते हुए भी दिखाई देते हैं । ऐसी स्थिति में हमें नैतिक मूल्यों की भारतीय अवधारणा, प्रांसगीकता व इसकी उन्हें पुनस्थापना की कार्ययोजना पर विचार विमर्श कर समाज का मन बनाने की आवश्यकता है ।


नैतिक मूल्यों की आवश्यकता

आज आधुनिकता के नाम पर "लिव इन रिलेशन" की बात करते हैं तो पशु पक्षियों पक्षियों में तो यह नैसर्गिक है । कुछ अंग ढकने के लिए बने कपड़ों को कुछ रंग दिखाने के लिए छोटे करना ही और इस पर टिप्पणी के विरोध में "स्लटवॉक"करना है यदि आधुनिकता है तो जंगली अवस्था में मनुष्य नंगा ही घूमता था । आज भी कई वनवासी जातियां इसी अवस्था में है । फिर मनुष्य जंगल से बाहर क्यों आया ? यदि सड़कों पर,  Kiss of love के आयोजन आधुनिकता है तो घरों में शयनकक्ष बनाने की कल्पना मनुष्य ने क्यों की ?

यह सब कहने का तात्पर्य यह है कि आदमी अवस्था में मनुष्य जो स्वच्छंद तरीके से करता था, उससे मैं संतुष्ट नहीं था और इसलिए जंगल से बाहर आकर समाज बनाने की कल्पना उसने की । एक से दो व्यक्ति होते ही व्यवहार के कुछ नियम तय करने पड़ते हैं । समाज ने भी स्वेच्छा स्वीकार कर उसके अनुरूप जीवन यापन के लिए कुछ नियम बनाए और जो शाश्वत जीवन मूल्य कहलाते हैं । इसकी साधना बाध्यता नहीं है; किंतु अपेक्षा है  और जो इज्जत सीमा तक इसको जीवन में साकार करता है उसके अनुरूप ऋषि से देव तक श्रेणियां बन गई - इन्हीं शाश्वत जीवन - मूल्यों को भारत में धर्म कहा गया है ।
इसी प्रकार कुछ नियम बाध्यता की सीमा तक जाते हैं । इनका पालन न करने पर दंड विधान होता है । इन्हें नीति या विधान कहते हैं । इस प्रकार हम कह सकते हैं कि कुछ स्वयं स्वीकृत नियम होते हैं जिनका पालन मनुष्य को नर से नारायण बनाता है तथा कुछ शासन द्वारा निर्धारित नियम होते हैं जिनसे समाज व्यवस्था का नियमन होता है । कोई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर या आधुनिकता की झोंक में इनके उल्लंघन का प्रयत्न करता है तो इससे अराजकता व अनैतिकता  उत्पन्न होगी और समाज - धारणा विच्छेद हो जाएगी ।


नैतिक मूल्यों की स्थापना की
आयाम

समय के साथ समाज - परिवर्तन एवं  तदनुरूप व्यवस्था परिवर्तन होता है । इन दोनों में संतुलन सफल समाज व राष्ट्र का घोतक होता है । समाज में आमूल - चूल परिवर्तन नहीं होता। समाज जीवनमान इकाई है अतः प्राणी की वृद्धि एवम् विकास की तरह समाज में भी परिवर्तन मूलधुरी अधिष्ठान स्थान पर ही होता है ।


पतझड़ आने पर झड़ जाते
पल्लव जो पीले पड़ जाते हैं ।
वे पुरातन कह कभी ना अड़ते
नव किसलय तब सरसाते हैं ।।

पर मूल पुरातन होने पर भी
कब वृक्ष उसे तज पाता है ।
धुरी सनातन पर हो तो सब,
नूतन परिवर्तन होता है ।


(क) आनुवंशिकता :- जैसे सजीव प्राणी में पीढ़ी दर पीढ़ी संतति में गुणों के संचरण के संबंध में अनुवांशिक नियम होते हैं उसी प्रकार समाज व राष्ट्र की भी एक सनातन चिति होती है जिसे संस्कृति कहते हैं । इस संस्कृति से समाज का DNA बनता है । भारत के नैतिक मूल्य इसी परंपरा से विकसित हुए हैं । धर्म के 10 लक्षण, पंचशील का सिद्धांत, कर्म की अवधारणा, पुरुषार्थ की परिकल्पना, सोलह संस्कारों की भावना, आश्रम व्यवस्था, परिवार व कुटुंब की संकल्पना, विश्व को आर्य बनाने की कामना-  ये हमारे मूलाधार हैं जिन पर हमें अपने जीवन मूल्यों का भव्य प्रासाद खड़ा करना है । अतः हमारे सब नीति - नियम, पाठ्यक्रम, सह शैक्षिक गतिविधियां , हमारा साहित्य, कला, व्यवहार इसी से निर्धारित होता होना चाहिए !   इसके लिए निषेध लादने की आवश्यकता नहीं , विद्यायी बातों के लिए मन बनाने की व्यवस्था, आवश्यकता है ।


(ख) परिवेश:- समाज व व्यक्ति के श्रेष्ठ सिद्धांत भी गौण हो जाते हैं जब उन्हें पल्लवन- पुष्पन के लिए अनुकूल वातावरण नहीं मिलता। हजारों वर्षों के अनुभव के पश्चात भारत ने कुछ श्रेष्ठ परंपराएं स्थापित की थी । प्राचीन भारत में शिक्षा' नामक पुस्तक में हार्टमट शार्फे लिखते हैं "प्राणी जगत में वातावरण ीय कारकों तथा डार्विन के चयन सिद्धांत के अनुसार शारीरिक एवं बौद्धिक लक्षण संतति  में  संचारीत होते हैं । मनुष्य में बहूतांश में यह प्रक्रिया विचारपूर्वक होती है; किंतु मानव इतिहास में यह व्यक्तिगत प्रयत्न की तुलना में सर्वाधिक समाज के सामूहिक चैतन्य से संभव हुआ है । इस प्रकार सामूहिक शिक्षा ने  यद्यपि वैयक्तिक व्यवस्था में लाखों परिवर्तनों के माध्यम से भाषिक एवं प्रशासनिक सीमाओं तथा भौगोलिक बताओ जैसे विशाल नदियां, पर्वत श्रेणियां, मरुस्थलो एवं सघन वनों के पार भारत की सांस्कृतिक एकता का सृजन किया । "

अतः भारत का परिवेश पुनः नीति और धर्मयुक्त बनाना प्राथमिकता है । इसके लिए चार स्तरों पर कार्य करने की आवश्यकता है:- परिवार, विद्यालय, समाज व विश्व । इन चारों की क्रमबद्ध यात्रा से ही "वसुदेव कुटुंबकम" का स्वप्न साकार हो सकता है। सर्व स्थानों पर भोगवादी वातावरण को समाप्त करने के लिए देविय वातावरण का विस्तार आवश्यक है । नकारात्मक बातों से ऋणआत्मक उर्जा प्रसारित होती है और व्यक्ति में आत्म ग्लानि व हतोत्साह की मनोवृति उत्पन्न होती है । समाज में होने वाले छोटे-छोटे "अणुव्रतों" को प्रोत्साहन तथा प्रेरणा से सत्कर्म की प्रवृत्ति निर्मित होती है । ऐसा परिवेश बनाने के लिए संगठित पहल की आवश्यकता है ।



(ग) पुरुषार्थ:- समाज की सैद्धांतिक उच्च अवधारणाओं तथा अनुकूल परिवेश के उपरांत भी व्यक्ति स्वयं परिवर्तन के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ नहीं होता तो परिणाम नहीं आता। जीवन मूल्यों की साधना व्यक्तिगत है प्रकटीकरण  सार्वजनिक है और निर्मित वातावरण सामाजिक है । व्यक्तिगत साधना के लिए संकल्प की आवश्यकता होती है तथा संकल्प से च्युत न हो व संकल्प पुष्ठ हो इसके लिए सकारात्मक परिवेश की आवश्यकता होती है । अतः नैतिक मूल्य निर्माण के यह आयाम अन्योंयाश्रीत है ।


नैतिक मूल्यों की स्थापना कैसे :- प्रारब्ध, परिवेश और पुरुषार्थ की त्रियुती के संलयन की भट्टी कौनसी है ? अब तक के प्रयत्नों में सर्वाधिक चर्चा नैतिक शिक्षा के पाठ्यक्रम की होती है । निश्चित तौर पर इसका महत्व है किंतु पढ़ाने वाला शिक्षक अनैतिक हो तो ? विद्यार्थी जिस परिवार से आ रहा है उसका वातावरण भोगवादी, आसुरी हो तो जिस प्रशासनिक तंत्र का यह सब हिस्सा है, वही भ्रष्ट हो तो ? इसलिए नैतिक मूल्यों की स्थापना हेतु आवश्यक "नैतिक शिक्षा" की संकल्पना बहु आयामी है । अभिभावक, बालक शिक्षक व प्रशासनिक तंत्र के चतुर्भुज स्वरूप को उपयुक्त तीन आयामों:- प्रारब्ध, परिवेश व पुरुषार्थ  के कुशल संयोजक से पुष्ट करने की दीर्घकालिक योजना पर कार्य करने की आवश्यकता है । इनमें से सबसे महत्वपूर्ण कड़ी शिक्षक हैं । शिक्षक प्रशिक्षण, चयन, मूल्यांकन की पद्धति पर गहन चिंतन के लिए देशभर में राष्ट्रीय व सकारात्मक सोच वाले अथ्यताओ की कार्यशालाओं करने की आवश्यकता है । इनसे निकलने वाला नवनीत पुन: भारत को आध्यात्मिक एवं नैतिक संपदा से युक्त परम वैभव की ओर ले जाने वाला सिद्ध होगा, ऐसा लगता है ।



Monday, 30 March 2020

मूल्यों की शिक्षा ( Values ​​education )


आज देश में भ्रष्टाचार , अनाचार , दुराचार , हिंसा लूट एवं आत्महत्याएं , आदि समस्याओं में बहुत तेजी से बढ़ोतरी हो रही है, जिससे हम चिंतित अवश्य हैं लेकिन इसके समाधान का रास्ता नहीं दिख रहा है ।
समाधान के दो प्रकार हैं । एक तात्कालिक इन सारी बातों को रोकने का प्रयास जिस की चर्चा बड़ी मात्रा में समाचार माध्यमों एवम् लोगों में हो रही है । जैसे कानून - व्यवस्था ठीक से हो इस हेतु  सरकार के द्वारा पुलिस की पर्याप्त व्यवस्था हो, कानून और कड़े किए जाए । पुलिस - प्रशासन अपना दायित्व ठीक से निभाये इस प्रकार की अपेक्षाएं की जाती है और यह आवश्यक भी है। लेकिन देश का अधिकतर बौद्धिक वर्ग एवं नेतृत्व स्थाई समाधान हेतु विचार नहीं कर रहे हैं । किसी भी समस्या के स्थाई समाधान का विचार करना है तब सबसे प्रथम इसके कारण में जाने की आवश्यकता रहती है । ये समस्याएं , वास्तविकता में तो परिणाम है कारण कुछ और है ।


इसका प्रमुख कारण देश की वर्तमान शिक्षा व्यवस्था है । देश की शिक्षा में संस्कार , चरित्र निर्माण , नैतिकता , आध्यात्मिकता एवं मूल्यों की बात नहीं  होगी तब परिणाम क्या होगा ? समग्र विश्व भी इसी प्रकार की समस्याओं से जूझ रहा है। जिन देशों में आर्थिक , भौतिक संपदा है , विज्ञान - तकनीकी का भी अच्छी मात्रा में विकास हुआ है ।  इसमें से अनेक देशों में अनुशासन , नागरिक कर्तव्यपालन , (सिविक सेंस), राष्ट्रभावना , कर्मठता आदि बातें होने के बाद भी वहां सुख - शांति नहीं है । श्री महर्षि अरविंद ने कहा है कि - "जब से देश की शिक्षा का जीवन - मूल्यों से  विछोह हो गया  तब से देश के लोग धर्मभ्रष्ट - लक्ष्यभ्रष्ट हो गए ।"

देश के सभी आधुनिक महापुरुषों ने भी शिक्षा में जीवन - मूल्यों की आवश्यकता का अनुभव किया है । हमारे सारे पंथ - संप्रदाय के महापुरुषों ने विभिन्न धार्मिक ग्रंथों में इसका जिक्र किया है। स्वतंत्र भारत के सारे आयोग ने भी मूल्य - शिक्षा की वकालत की है; लेकिन आज तक सरकार द्वारा चलाई जा रही औपचारिक शिक्षा व्यवस्था में इसका समावेश नहीं किया गया । निजी स्तर पर कुछ  शैक्षिक , सामाजिक ,आध्यात्मिक संस्थाओं के द्वारा नैतिक , आध्यात्मिक ,धार्मिक जीवन - विद्या , मानव - मूल्य एवं जीवन - मूल्य आदि शीर्षक के तहत इसको शिक्षा में सम्मिलित करने का प्रयास किया जा रहा है  । इस सभी का तात्पर्य लगभग समान है परंतु इसका परिणाम प्राय नहीं है। इस हेतु देश की समग्र शिक्षा मूल्य आधारित बने यह सर्वोच्च प्राथमिकता का विषय बनना चाहिए  ।
मूल्य का अर्थ
(Meaning of value)

👉 मूल्य शब्द धातुरूप मूल से बना होने के कारण इसका अर्थ जो मूल में , जड़ में है ,जो बीजरूप वृक्ष में विद्यमान है , जो मूलभूत आधारभूत तत्व है ।
👉 जिसमें आदर्श और पुरुषार्थ है , जिसमें मानव जीवन का संपूर्ण विकास हो सके ।
👉 मूल्य के अंतर्गत सभी गुण समाविष्ट होने चाहिए जिसका संबंध आंतरिक (आत्मनेपद) बाइए (परस्मैपद) और एक साथ दोनों से उदयपद !


शिक्षा का अर्थ
(Meaning of education)

शिक्षा के उद्देश्य के संदर्भ में ऋग्वेद में कहां है 
"असतो मा सदगमय , तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मामृतंगमय"  (असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर, मृत्यु से अमरत्व की ओर ले जाए) दूसरे शब्दों में कह टो "सा विद्या या विमुक्तये" विद्या (शिक्षा) वह है जो व्यक्ति के जीवन को प्रत्येक बंधन से मुक्ति दिला सके । शिक्षा के लक्ष्य और जीवन के लक्ष्य में कोई अंतर नहीं होना चाहिए । उपयुक्त कथन से कुछ लोगों के मन में भ्रम होता है कि हम शिक्षा में  मात्र आध्यात्मिकता की बात करते हैं; परंतु यह गलत धारणा है । हमारा मूल आध्यात्मिकता अवश्य है लेकिन अपने यहां धर्म और मोक्ष के साथ अर्थ और काम ऐसे चार पुरुषार्थ की बात कही है। अर्थ और काम का महत्व अपने यहां कभी कम नहीं माना गया है परंतु अर्थ और काम धर्म आधारित हो यह सोच ही मूल्यों को प्रतिबंधित करती है। अगर भारत भौतिक दृष्टि से संपन्न नहीं होता तो विदेशी आक्रमक लूट के लिए भारत में क्यों आते ? हमारे यहां आध्यात्मिकता एवम् भौतिकता दोनों का संतुलित दृष्टिकोण था। इस दृष्टिकोण को आधुनिक शब्दों में "एजुकेशन फॉर लिविंग एंड लाइफ" कहा है । अर्थात शिक्षा से जीवन जीने का दृष्टिकोण एवं जीवन निर्वाह हेतु आवश्यक क्षमता निर्माण होना चाहिए ।

इस दृष्टिकोण से देश की शिक्षा का स्वरूप हमारी संस्कृति , प्रकृति एवं प्रगति के अनुरूप बने। शिक्षा से अभिप्रेत है - व्यक्तित्व का समग्र विकास एवं चरित्र निर्माण , देश एवं समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति तथा राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों का समाधान हो । शिक्षा की इस संकल्पना को साकार करने हेतु शिक्षा में मूल्यों का समावेश अनिवार्य है ।

👉 भारतीय जीवन मूल्यों को समझने की मुख्यतः तीन दृष्टिया हो सकती है ।

1. दार्शनिक आधार ।
2. सामाजिक चेतना ।
3. वैयक्तीक चरित्र व आचरण ।

👉 गुरुवाणी में कहा गया है कि "सच सबसे ऊपर है यदि उससे ऊपर कुछ है तो वह सच का आचरण।"

👉 "गुरुनानक" 
__कीरत करो , नामजपो, बं छको अर्थात 'संगत, पंगत और लंगर' के दर्शन का प्रतिपादन करते हुए सामाजिक समरसता का प्रचार किया ।
👉 उपनिषद के तीन द 'द - द - द' स्वर हमें दमन, दान, दया को जीवन मूल्यों के रूप में अपनाने की शिक्षा देता है ।

👉 जैन दर्शन
__जैन दर्शन में सत्य , अहिंसा , अस्तेय , अपरिग्रह एवं ब्रह्मचर्य  मूल्यों पर बल दिया गया है ।
__जो अपना नहीं है उसे प्राप्त करने की इच्छा भी चोरी है ।

👉 श्रीमदभागवत में तो कहां है - अपने जीवन निर्वाह की आवश्यकता से अधिक जो अपने पास रखता है अर्थात दान नहीं करता  वह - चोरी के धन का ही उपयोग करता है ।

👉 स्वामी विवेकानंद
"पत्थर की मांसपेशियां और फौलाद के भुजदंड" मन से छिछली भावुकता के प्रवाह को निरुद्ध करने में समर्थ और बुद्धि से विभिन्न प्रकार की शिक्षा- कला तथा वैज्ञानिक विद्याओं को आत्मसात करने को तत्पर विद्यार्थी - जीवन में इन गुणों के विकास के लिए ही ब्रह्मचर्य को जीवन - मूल्यों के रूप में अपनाने की आवश्यकता को रेखांकित किया गया था ।
  
if  wealth is lost nothing is lost
If health is lost something is lost
but character is lost everything is lost




👉 छात्रों व शिक्षकों द्वारा स्वमूल्यांकन

__ सतत निरीक्षण से
__अभिभावकों से संपर्क करके
__ अन्य अभिरुचियों से
__ समूह में कार्य के अवलोकन से
__ वार्तालाप से
__ लिखित परीक्षा से
__ दायित्व प्रदान कर परिणामों को आंकने से
__ विशेष परिस्थिति निर्माण कर उसके व्यवहार को देखने से
__ प्रकृति - प्रकोप तथा अन्य आंतरिक , बाह्य कष्ट की घड़ी में उसकी सहभागिता से
__ खेलकूद की रोटियों से
__ पुस्तकालय से लेकर जाने वाली पुस्तकों से
__ अन्य सभी आचार्यों , सहपाठियों के अभिमत से आदि ।



"अगर किसी देश को भ्रष्टाचार मुक्त और सुंदर मन वाले लोगों का देश बनाना है तो , मेरा दृढ़ता पूर्वक मानना है कि समाज के तीन प्रमुख सदस्य ये कर सकते हैं, माता-पिता और गुरु ।"

                            
                    __    डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम



Tuesday, 24 March 2020

घर बैठे पैसे कैसे कमाए ? How to earn money at home ? Home based business ! Work from Home ! Money


कोरोना वायरस के चलते सारे ऑफलाइन बिजनेस बंद पड़े हैं , अगर इस वक्त हम आंकड़े देखें तो इंडिया में मेजर सिटीज बंद हो चुकी है ।

अगर शॉपिंग मॉल के बारे में बात करें तो शॉपिंग मॉल बंद पड़े हैं ।

अगर बात करें सिनेमा हॉल्स की तो सारे सिनेमा हॉल्स बंद पड़े हैं ।


जिम , जो लोग रोज जिम जाते थे वह जिम नहीं जा पा रहे हैं , क्योंकि जिम बंद पड़े हैं ।

जो बड़े-बड़े कारखाने हैं फैक्ट्रीज है इस वक्त बंद पड़ी है ।

मार्च का महीना एक ऐसा महीना होता है जब बच्चों के EXAM खत्म हो जाते हैं और मां - बाप अपने बच्चों को बाहर घुमाने ले जाते हैं ।

अगर इस वक्त हम देखकर तो पूरी टूरिज्म इंडस्ट्री बंद पड़ी है।
टूरिज्म हो ही नहीं रहा है । आप होटलों के  प्राइस देखिए एकदम गिर चुके हैं , सारे होटल्स खाली पड़े हैं।

अभी सेमिनार के ऊपर बेन लग चुका है । कोई इवेंट नहीं हो रहा है । सारे इवेंट रद्द हो चुके हैं। मूवीस की रिलीजिंग रुक चुकी है ।

automobiles industry भी  production नहीं कर पा रही हैं।
क्योंकि majorly dependent है चाइना पर ।
और जितनी भी दूसरी industry है जो  RO material  के लिए या parts के लिए  dependent है chaina par  अभी बंद पड़ी है ।
कोरोना वायरस के चलते या कोरोना वायरस की वजह से कहीं ना कहीं हर इंडस्ट्री बंद पड़ी है , या प्रभावित हुई है ।

लोग घर से बाहर जाना safe नहीं समझ रहे हैं। Corporates ने बोल दिया है कि वर्क फ्रॉम होम कर लो ।

इस वक्त जितने भी छोटे व्यापारी हैं वह खुद बोल रहे हैं कि हमारा business 50 से 60 प्रतिशत गिर चुका है ।
हो सकता है आप या आपके घर वाले कहीं ना कहीं कोरोनावायरस से  इफेक्ट हो चुके हो।
In term of business.

हो सकता है कि आपकी नौकरी खतरे में आ  चुकी हो ,  हो सकता है किसी का व्यापार बंद हो चुका हूं या ठप हो चुका हूं ।

मुझे नहीं पता कि कोरोनावायरस की सिचुएशन कितने और टाइम तक रहेगी ।
क्या यह और विशालकाय रूप ले लेगी।
Even I do not know .
अगर मैं इसका आपको एक पॉजिटिव एंगल बताऊं तो , आपको मैं बताना चाहूंगा कि इसका एक पॉजिटिव साइड देखे तो यह है कि कोरोनावायरस कहीं ना कहीं एक अपॉर्चुनिटी लेकर आया है।

अगर आप देखें तो जो  business offline थे  वो इस वक़्त बंद हो चके है । लेकिन अगर यह देखे की जिनके online business थे क्या वो चल रहे है तो ' हां ' जिन लोगों के business on-line थे वो इस समय चल रहे हैं और लोग पैसा भी कमा रहे हैं ।


# इंटरनेट से पैसे कैसे कमाए ऑनलाइन बिजनेस आइडियाज #  (# How to earn money from Internet Online Business Ideas #)


1. Blog website
2. YouTube channel
3. Instagram page
4. Online seller
5. ECOM website
6. Consultant service
7. Web development
8. App development
9. Digital marketing
10. Content creator
11. graphic designer
12. By doing a startup

आप इनमे से कौन सा बिजनेस करेंगे या अपना ऑनलाइन बिजनेस कमेंट करें ।


★ किताबें जो हर बिजनेसमैन को पढ़नी चाहिए ★( Books that every Businessman should Read )


अगर आप अपना बिजनेस करना चाहते हैं तो आप इन किताबों को पढ़कर लाइफ में सक्सेस  पा सकते हैं ।

1. Rich dad poor dad
2. Zero to one
3. The 4 - hour work - week
4. Think and grow rich
5. 7 habits of highly effective people
6. How to win , friends & influence people

इन सारे बिजनेस के बारे में मैं आपको अगली पोस्ट में जरूर बताऊंगा ।

हर एक बिजनेस आइडिया पर आपको डिटेल मैं एक पोस्ट बनाकर जरूर बताऊंगा एक आर्टिकल लिखकर ।।

आशा करता हूं कि आपको यह पोस्ट अच्छी लगी होगी ।

Monday, 23 March 2020

पढ़ाई में मन कैसे लगाएं ( How to set your mind on studies )


अगर आपको एक बेहतर भविष्य चाहिए , तो हमें मन लगाकर पढ़ना होगा । लेकिन पढ़ाई में  तो हमारा मन ही नहीं लगता क्यों ?

हम बच्चों को पढ़ाई कैसे करनी चाहिए, क्यों करनी चाहिए यह समझाया तो ज्यादा बेहतर रहेगा ।
अक्सर माता-पिता अपने बच्चों से पढ़ा करो , पढ़ा करो बस यही कहते हैं । पर पढ़ाई क्यों करनी चाहिए यह कोई नहीं बताता ।

वर्तमान समय में सिर्फ शिक्षा में ही नहीं हर क्षेत्र में competition बढ़ चुका है , तो इसमें बच्चों को बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ता है । बच्चों का पढ़ाई में मन नहीं लगता ऐसे में कभी ना कभी हर स्टूडेंट के मन में यह सवाल आता है कि पढ़ाई में मन कैसे लगाएं ।

And how to do a quality study.

आप अगर कोई भी काम करते हैं और उसमें आपका मन नहीं लगता है , फिर भी आपको किसी कारणवश  वह काम करना पड़ता है । ठीक उसी तरह यही problam students को भी face करनी पड़ती है ।

एक रिपोर्ट के अनुसार सिर्फ 20% बच्चे ही पढ़ाई को लेकर सीरियस है । और वह पढ़ाई मन लगा कर कर पाते हैं तो बाकी 80% स्टूडेंट मन नहीं लगा पाते हैं क्यों ?

आज की इस पोस्ट में , मैं आपको बताऊंगा कि पढ़ाई में मन कैसे लगाएं और एक अच्छी क्वालिटी वाली पढ़ाई कैसे करें । आशा करूंगा कि आपको मेरा यह आर्टिकल पसंद है।





★ पढ़ाई में मन कैसे लगाएं ★

अक्सर आपने देखा होगा कि आपको किसी सब्जेक्ट या बुक में दिलचस्पी है , तो आप उसको बिना थकावट के पढ़ लेते हैं । और आपका मन अपने आप उस बुक में या उस सब्जेक्ट में लग जाता है ।
तो आप ऐसा क्या करें कि आपका मन हर विषय या सब्जेक्ट में लगे । तो इसके लिए  मैं आपको कुछ टिप्स एंड ट्रिक्स बताऊंगा । जिन्हें आप फॉलो करके 100%  पढ़ाई में मन लगा पाएंगे।


★पढ़ाई क्यों करें ★


पढ़ाई में मन ना लगने का कोई ना कोई कारण आपके पास भी जरूर होगा।

हमें खुद से यह सवाल करना होगा कि हम पढ़ाई क्यों और किसलिए करें ? पढ़ाई करने से हमें क्या मिलेगा।
क्योंकि किसी भी काम को करने से पहले उसकी पूर्ण जानकारी हमारे पास होना बहुत आवश्यक है।

आखिरकार हम किसी काम को क्यों कर रहे हैं उसके फायदे और नुकसान हमें पता होना चाहिए।

अगर हम किसी काम को कर रहे हैं और क्यों कर रहे हैं इसकी जानकारी हमें नहीं है या उससे क्या परिणाम मिलेगा यह हम नहीं जानते हैं तो उस कार्य को करना व्यर्थ है।

क्योंकि हम किसी काम को थोड़ी देर के लिए करते हैं और फिर छोड़ देते हैं, यही सब पढ़ाई में भी लागू होता है।

और यह सवाल आप खुद से पूछे तो ज्यादा बेहतर रहेगा।


★ टाइम टेबल बनाकर के पढ़े ★


जिस तरह स्कूल या कॉलेज में कौन सा सब्जेक्ट कौन सा टीचर किस वक्त पर पढ़ाएगा इसकी एक समय सारणी होती है। और उसी तरह है आपको अपने लिए भी एक समय सारणी बनानी है , समय सारणी बनाकर पढ़ने के बहुत से फायदे हैं ।
अगर आपकी पढ़ने में बिल्कुल रुचि नहीं है तो आप शुरुआत में कोई बड़ी लंबी चौड़ी समय सारणी ना बनाएं।
आप सिर्फ शुरुआत में 1 से 2 घंटे पढ़ने की ही समय सारणी बनाएं और इसमें भी आप बीच में ब्रेक लेते रहें।
फिर आप अपनी इच्छा अनुसार इस टाइम टेबल में बदलाव कर सकते हैं।
* जब आप समय सारणी बनाकर के पड़ेंगे तो आपको पता होगा कि कब क्या पढ़ना है।
*  इस तरह आप टाइम मैनेज कर पाएंगे।

★ ग्रुप बनाकर पढे ★

अगर आपने अभी पढ़ाई की शुरुआत की है तो बेहतर रहेगा कि आप ग्रुप स्टडी करें अपने फ्रेंड्स के साथ अपने क्लासमेट के साथ क्योंकि इससे आप कभी भी बोर नहीं होंगे इससे आप बीच-बीच में ब्रेक ले सकते हैं  हंसी , मजाक कर सकते हैं।

और इस तरह से आपकी आपको जल्दी समझ में भी आएगा।

★ नोट्स बनाएं ★

* एग्जाम के टाइम पर रिवीजन के लिए बेस्ट होता है।
* Time bachta hai.
* जल्दी समझ में आ जाता है।


इसलिए बेटर रहेगा कि आप नोट्स बना करके पढ़ें ।


★ पढ़ाई से पहले ध्यान – Meditation ★


पढ़ाई शुरू करने से पहले आपको कुछ मिनिट Meditation यानि कि ध्यान करना चाहिए. ज्यादा नहीं बस 5Min।परन्तु इस 5Min के समय आपका पूरा ध्यान सिर्फ वही पर होना चाहिए. अपने मन को शांत कीजिये. सारी बातों को भूल जाएगी. पूरा ध्यान एक जगह केंद्रित कीजिये।अगर 5Min के इस ध्यान को आप अच्छे से कर लेते हैं तो आगे आपको पढ़ाई करने में कोई दिक्क़त नहीं होगी।

इंपॉर्टेंट टिप्स

!! पढ़ाई का Time Table बनाएँ !!

!! Notes बनाएँ !!

!! हर दिन की पढ़ाई का Goal Set करें !!

!! लम्बे समय तक पढ़ाई करने पर थोड़ा Break लें !!

!! Offline पढ़ाई के साथ साथ Online भी पढ़ें !!

सारांश – Conclusion

आशा करते आपको इन ऊपर दिए हुए पढ़ाई करने के ज़बर्दत टिप्स अच्छे लगे होंगे। अगर आप इन सभी पॉइंट्स पर ध्यान देंगे तो आपको पढना बहुत अच्छा लगेगा और पढ़ाई में आप तेज़ भी बनोगे। अगर आपको यह टिप्स अच्छे लगे हैं तो अपने दोस्तों को सोशल मीडिया पर ज़रूर शेयर करें।


Friday, 20 March 2020

Covid : 19 क्या है पूरी जानकारी, लक्षण / उपाय ( Covid: 19 What is complete information, symptoms / remedy )




कोरोना वायरस : 3 जरूरी बातें 

1 अपने हाथ धोएं।
2 खांसते वक्त टिशू का इस्तेमाल करें।
3 अपने हाथ से अपना चेहरा ना छुएं ।


विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार कोरोना वायरस ( कोविड - 19 ) अब दुनिया के 166 देशों में फैल चुका है , और इसके कारण 8,657 मौतें हो चुकी है ।
कोरॉना वायरस ( कोवीड -19 ) क्या है और यह कैसे फैलता है? इससे बचने के लिए आप नियमित रूप से साबुन / हैंडवॉश और पानी से अच्छे तरीके से अपने हाथ धोएं ।

आप अपने हाथों को सैनिटाइजर से हर आधे घंटे में साफ करते रहें।



अगर आप किसी हॉस्पिटल में जाते हैं या किसी भी सार्वजनिक स्थान पर जाते हैं , या आप कहीं ग्रुप में बैठे हैं तो मास्क का उपयोग करें।

जब कोरोना वायरस से संक्रमित कोई व्यक्ति  खांसता या छिकता है तो उस वायरस के कण हवा में फैलते हैं , इन कणों में कोरोना वायरस के कीटाणु होते हैं।

अगर आप किसी संक्रमित व्यक्ति के पास जाते हैं या किसी ऐसी जगह छूते हैं जहां पर कॉरोना वायरस कीटाणु मौजूद हैं , और फिर  बाद  में उसी हाथ से आंख , नाक या  मुंह को छूते  हैं तो यह कण आपके शरीर में पहुंच जाते हैं ।

ऐसे वक्त में आप मास्क का उपयोग करें खांसते व  छिकते वक्त टिशू का उपयोग करें।
संक्रमित व्यक्ति के पास जाने से बचें।



★कोरोना वायरस से बचने व इसे फैलने से रोकने के लिए आप क्या कर सकते हैं ?


1. हर आधे घंटे में अपने हाथ साबुन से धोएं या फिर सैनिटाइजर का इस्तेमाल करें।
2. हाथ बिना धोए आंख , नाक व मुंह पर ना रखें।
3. खांसते व छीकते वक्त टिशू का इस्तेमाल करें।
4. उपयोग किए हुए टिशू को फेंक दें ।
5. बीमार व्यक्ति के पास जाने से बचे।
6. अगर आपके पास टिशू  उपलबध् नहीं है तो आप रुमाल या अपनी बाजू का  उपयोग कर सकते हैं।

★ लक्षण


इंसान के शरीर में कोरोना वायरस पहुंचने के बाद उसके फेफड़ों में संक्रमण करता है । सर दर्द , खांसी और बुखार जैसे लक्षण देखने को मिल सकते हैं।
वायरस के लक्षण दिखने में कम से कम 5 दिन लगते हैं । वैज्ञानिकों का कहना है कि इसके लक्षण उन्हें बहुत बाद में भी देखने को मिल सकते हैं ।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार वायरस के शरीर में पहुंचने के बाद लक्षण दिखने के बीच 14 दिनों या 24 दिनों का समय लग सकता है ।


कहीं जानकारों का यह कहना है कि व्यक्ति के बीमार होने से पहले भी यह वायरस फैल सकता है।

कॉमन लक्षण

1. तेज सिरदर्द।
2. सुखी खांसी।
3. मांसेशियों में दर्द ।
4. बुखार और थकान।
5. सांस लेने में दिक्कत।



कॉरॉना वायरस संक्रमण बुजुर्गों और पहले से मधुमेह , हृदय रोगी, और सांस की बीमारियों जैसी परेशानियों का सामना करने वालों को यह वायरस अत्यधिक रूप से बीमार कर सकता है ।
कोरोना वायरस का टीका बनाने का काम अभी चल रहा है।

★ संक्रमित लोगों के लिए सलाह


1. अपने इलाके में मौजूद डॉक्टर या स्वास्थ्य कर्मी से फोन पर बात करें।
2. अस्पताल जाने से बचें।
3. अपने आपको दूसरों से दूर रखें।
4. कॉविड - 19 वायरस के लिए आपकी जांच की जा सकती है।
5. जरूरत पड़ने पर डॉक्टर या नर्स आपको क्या करना है , इसकी सलाह देंगे।
6. अगर आप संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आते हैं तो कुछ दिनों तक अपने आप को दूसरों से  दूर रखें।

भारत के अलावा दूसरे देशों ने भी इस वायरस से बचने के लिए अपने देशों में स्कूल-कॉलेज, सार्वजनिक स्थान आदि आदि को बंद कर दिया है ।
सब पर आई है एक साथ मुसीबत , अगर सब एक साथ मिलकर इसका सामना करेंगे , तो इसमें से निकल जाएंगे ।

खुद पर और दूसरों पर भरोसा करोना।

प्लीज पार्टी मत करोना।

ट्रैवल मत करोना ।

लोगों को मत मिलोना ।

नेटफ्लिक्स अकेले करोना ।

घर से काम करोना ।

घर के काम करोना ।

घर पर काम करोना ।

अभी शादी मत करोना ।

मम्मी पापा के साथ टाइम स्पेंड करोना।

मेडिटेटेड करोना ।

हैंड वॉश करोना ।

फेस टच मत करोना ।

फेस मास्क यूज करोना ।

gf-bf से मत मिलोना ।

सब से दूर रहोना ।

कोरोना स्टॉप करोना ।।

22 मार्च रविवार के को हमारी सरकार ने जनता कर्फ्यू लगाया है , यानी कि इस दिन हमें घर से बाहर नहीं निकलना है , ना ही सड़कों पर जाना है,  ना ही मोहल्ले में इकट्ठा होना है ! यह भारी विपदा हम सब पर आई है , तो हम सबको मिलकर इसका सामना करना होगा!!

मैं तो इस जनता कर्फ्यू का पालन करूंगा क्या आप करोगे ?? कमेंट में बताओ!!

Tuesday, 17 March 2020

युवा पीढ़ी को स्वामी जी का संदेश(Swamiji's message to the younger generation) part 2


अपने इतिहास को जानो


अतीत से ही भविष्य बनता है । अत: यथासंभव अतीत की ओर देखो , पीछे जो चिरंतन निर्जर बन रहा है, भरपेट उसका जल पिओ और उसके बाद सामने देखो और भारत को उज्जवलतर महत्तर और पहले से अधिक ऊंचा उठाओ ।........ हमारे पूर्वज महान थे। हम भारत के गौरवशाली अतीत का जितना ही अध्ययन करेंगे, हमारा भविष्य उतना ही उज्जवल होगा। हमारे पीछे परंपरागत संस्कार और हजारों वर्षों के सत - कर्म है , उन्हीं से संबल प्राप्त कर वर्तमान सामाजिक व्यवस्था और भी सुदृढ़ बन सकेगी । हमारे उपनिषदों, पुराणों और अन्य सब शास्त्रों में जो अपूर्व सत्य छिपे हुए हैं , उन्हें इन ग्रंथों के पन्नों से बाहर निकालकर , मठों की चारदीवारीयां भेदकर  वनों की निर्जनता से निकालकर , कुछ विशेष संप्रदायों के हाथ से छीन कर देश में सर्वत्र बिखेर देना होगा , महापुरुषों के त्याग , निष्ठाथा धैर्य के आदर्श सामने लाना होगा , ताकि नई पीढ़ी उससे सीख लेकर आगे बढ़ सके ।

शिक्षा हमारी मूलभूत आवश्यकता



स्वामी विवेकानंद ने कहा है - "जिस राष्ट्र की जनता में विद्या - बुद्धि का जितना ही अधिक प्रचार है, वह राष्ट्र उतना ही उन्नत है। भारत के सर्वनाश का मुख्य कारण यही है कि देश की सारी विद्या बुद्धि , राज्,- शासन और दंभ के बल पर मुट्ठी भर लोगों के एकाधिकार में रखी गई । यदि हमें फिर से उन्नति करनी है, तो हमको उसी मार्ग पर चलना होगा, अर्थात जनता में विद्या का प्रसार करना होगा।" भारत के लोगों को यदि आत्मनिर्भर बनने की शिक्षा न दी जाए, तो सारे संसार की दौलत से भारत के एक छोटे से गांव की भी सहायता नहीं की जा सकती हैं । नैतिक तथा बौद्धिक - दोनों ही प्रकार की शिक्षा प्रदान करना हमारा पहला कार्य होगा चाहिए । हर राष्ट्र, हर पुरुष और स्त्री को अपना उद्धार स्वयं करना होगा। उन्हें विचार दे दो - बस, बाकी सब वे स्वयं कर लेंगे । भारत में बस यही करना है।

चाहिए सच्चे देश भक्तों की टोली



जिस राष्ट्र ने अतीत में हमारे लिए जितने इतने बड़े-बड़े काम किए हैं , उसे प्राणों से भी प्यारा समझो ।.........  क्या तुम यह अनुभव करते हो कि अज्ञान के काले बादल ने सारे भारत को ढक लिया है ? यह सोचकर क्या तुमको बेचैनी  होती है ? क्या इस सोच ने तुम्हारी निद्रा छीन ली है कि भारत के लोग दुखी हैं? यदि 'हां' तो फिर तुम देशभक्त बनने की पहली सीढी पार कर गए हो । यदि तुमने केवल व्यर्थ की बातों में शक्ति क्षय न करके, इस दुर्दशा के निवारण हेतु कोई यथार्थ कर्तव्य - पथ निश्चित किया है , स्व देशवासियों को इस जीवनमृत दशा से बाहर निकालने - उनके दुखों को कम करने के लिए दो सांत्वनादायक शब्दों को खोज लिया है , तो यह तो दूसरी सीढ़ी है । और यदि तुम पर्वताकार  विध्न - बाधाओं को लांघकर राष्ट्रकार्य करने के लिए तैयार हो, सारी दुनिया विरोध में खड़ी हो जाए तो भी निर्डरता से सत्य की रक्षा के लिए खड़े रहने और संगी साथियों के छोड़ जाने पर भी यदि तुम राष्ट्रोंत्थान के अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहोगे , तो यह तीसरी सीढी है।
देशभक्त बनो, जिस राष्ट्र ने अतीत में हमारे लिए इतने बड़े-बड़े काम किए हैं, उसे प्राणों से भी प्यारा समझो ।.......... भारत तभी जागेगा, जब विशाल हृदयवाले सैकड़ों स्त्री-पुरुष भोग - विलास और सुख की सभी इच्छाओं को विसर्जित कर मन , वचन और शरीर से उन करोड़ों भारतवासियों के हित के लिए सचेष्ट होंगे जो दरिद्रता तथा मूर्खता के अज्ञात सागर में निरंतर डूबते जा रहे हैं ।

भागो मत ,सामना करो



ओ राष्ट्रयोद्धा! जागो और सपने देखना बंद करो । मृत्यु तुम्हें भी पकड़ ही लेगी........तब तक डरो मत। रणक्षेत्र से दूर भागना यह मैंने कभी नहीं किया है , तो क्या अब ऐसा होगा? क्या हारने के डर से मैं मुकाबला छोड़ दूंगा?....... जब में मुकाबला करता हूं तो सिंह की तरह, कमर कसकर मैं समझता हूं कि वही व्यक्ति हीरो है, वरन भगवान है जो यह कहता है- 'परवाह मत करो  निडर बनो। हे वीर, मैं तुम्हारे साथ हूं । ऐसे ईश्वरीय पुरुष को मैं हजारों बार प्रणाम करता हूं । उनकी उपस्थिति ही संसार को पवित्र बनाती है। वे ही संसार के रक्षक हैं । दूसरी और जो लोग सदैव यही विलाप करते हैं - 'आगे मत जाओ , वहां यह खतरा है , वहां वो खतरा है , वे हमेशा डर से कांपते रहते हैं । ऐसे लोग कृपा के पात्र हैं । वे कभी भी कुछ हासिल नहीं कर सकते ।"
चुनौतियों से भागो मत उनका सामना करो। अहिंसा जैसे सिद्धांतों के बहाने डरपोक मत बनो , स्वाभिमानी बनो। डर जाने से आगे बढ़ने का मार्ग अवरुद्ध होता है और हम अपनी असफलताओं के लिए दूत्कारे जाकर पीछे धकेल दिए जाते हैं । इन सब के पीछे हैं - आत्मविश्वास और आत्मसम्मान की कमी । 

पूर्ण एकाग्रता से लक्ष्य साधो



मैं कई बार प्रश्न करता था कि यदि हममें कार्य के प्रति उत्तेजना नहीं है तो फिर हम कार्य को कैसे पूरा कर सकेंगे । ऐसा में  पूर्व के कुछ वर्षों से सोचता था, किंतु जैसे - जैसे मुझे अनुभव प्राप्त हुए मैंने जाना कि यह सत्य नहीं है। उत्तेजना जितनी कम होगी हम उतने बेहतर ढंग से कार्य सकेंगे । हम जितने शांत होंगे , उतना बेहतर और अधिक कार्य हम कर सकेंगे । जब भी हम भावनात्मक रूप से कमजोर होते हैं, अपनी उर्जा को बर्बाद करते हैं , अपनी हिम्मत को तोड़ते हैं, मस्तिष्क को बाधित करते हैं और हम इस कारण बहुत थोड़ा कार्य ही कर पाते हैं। कार्य को संपन्न करने के लिए आवश्यक ऊर्जा को हम नगण्य व मामूली भावनाओं में गवा देते हैं । लक्षित कार्य तभी होगा जब मस्तिष्क शांत हो और सारी ऊर्जा केवल कार्य को पूरा करने में एकत्र हो। यदि तुम विश्व के प्रमुख महान व्यक्तियों की जीवनी पढ़ो तो तुम्हें ज्ञात होगा कि वे सब आश्चर्यजनक रूप से शांत प्रकृति के थे । कहीं भी , कुछ भी उन्हें असंतुलित नहीं कर पाता था । इसलिए एक व्यक्ति जो शीघ्र क्रोधित होता है,वह कोई भी बड़ा कार्य नहीं कर पाता और वह व्यक्ति जिसे कोई भी बात क्रोधित / विचलित नहीं करती वह कार्य को सफलतापूर्वक पूरा कर लेता है । एक व्यक्ति जो स्वयं को क्रोध , उत्तेजना या द्वेष - घृणा के मार्ग पर डाल देता है , कोई कार्य नहीं कर सकता , वह केवल स्वयं को टुकड़ों में बांटता है।


       ..................


Monday, 16 March 2020

स्वामी विवेकानंद की ओजस्वी वाणी ( Swami Vivekananda's powerful voice)


★  हम प्रत्येक आत्मा का आहवान करें , उत्तिष्ठत! जाग्रत !! प्राप्य वरान्निबोधत !!! अर्थात उठो, जागो और जब तक लक्ष्य प्राप्त ना कर लो , कहीं मत ठहरो। उठो! जागो!! दोबल्य के मोहजाल से निकलो, कोई वास्तव में दुर्बल नहीं है। आत्मा अनंत, सर्वशक्तिमान एवम् सर्वव्यापी है। खड़े हो, स्वयं को झकझोरो, अपने अंदर व्याप्त ईश्वर का आह्वान करो । उसकी सत्ता को अस्वीकार मत करो । अपनी जाति पर बहुत अधिक निष्क्रियता , बहुत अधिक दुर्बलता और बहुत अधिक माहजाल छाया रहा है और अब भी है।


★ओ वीर पुरुष ! साहस बटोर,  निर्भीक बन और गर्व  कर कि तू भारतवासी हैं। गर्व से घोषणा कर की ''में भारतवासियों हूं, प्रत्येक भारतवासी मेरा भाई है ।

★ मेरे भाई ! कह - "भारत की मिट्टी मेरा स्वर्ग है, भारत के कल्याण में ही मेरा कल्याण है ।"  अहोरात्र जपा कर , "हे गोरीनाथ ! हे जगदंबे ! मुझे मनुष्यत्व  दो। हे  शक्तिमयी माँ !मेरी दुर्बलता को हर लो; मेरी कालपुरुषता को दूर भगा दो और मुझे मनुष्य बना दो , माँ।"

अपने सुखों की, आनंदो कि , अपने यश की,  प्रतिष्ठा कि , यहां तक कि अपने प्राणों की भी आहूति दो और मानव आत्माओं का ऐसा सेतु बांध दो, जिस पर होकर यह करोड़ों नर नारी भवसागर को पार कर जाए । 'सत्य' की समस्त कठिनाइयों को एकत्र करो । यह चिंता मत करो कि तुम किस पताका के नीचे चल रहे हो । यह भी चिंता मत करो कि तुम्हारा वर्ण क्या है - लाल, हरा या नीला; बल्कि सब वर्णों को मिला दो और स्नेह के प्रतीक श्वेत रंग का प्रखर तेज उत्पन्न करो । हम केवल कर्म करें । परिणाम अपनी चिंता स्वयं करेंगे।

★ मैं भविष्यदृष्टा नहीं हूं ; न मैं उसके लिए चिंतित हूं ; किंतु, एक दृश्य मेरे सामने बिल्कुल स्पष्ट है कि  हमारी प्राचीन भारत मातृभूमि फिर एक बार जग उठी है। वह नवयौवन प्राप्त कर पहले से कहीं अधिक भव्य दीप्ति के साथ अपने सिंहासन पर बैठी हुई है । समस्त संसार को शांतिपूर्ण और मंगलमय वाणी से उसका संदेश सुनाओ ।

★ हमें खून में तेजी और स्नायुओं में बल की आवश्यकता है - लोहे की भुजाएं  और फौलाद के स्नायु चाहिए , ना की दुर्बलता लाने वाले निरर्थक विचार ।

★ यदि भारत को महान बनाना है , इसका भविष्य उज्जवल बनाना है , तो इसके लिए आवश्यकता है संगठन करने की और बिखरी हुई इच्छाशक्तियों को एकत्र करने की ।


★ मनुष्ययों की, केवल मनुष्यों की आवश्यकता है। और सब कुछ हो जाएगा ,किंतु आवश्यकता है वीर्य वान, तेजस्वी, श्रीसंपन्न और पूर्ण प्रमाणिक नव युवकों कि । मेरी आशाएं इस नवोदित पीढ़ी में, आधुनिक पीढ़ी में केंद्रीत है। उसी में से मेरे कार्यकर्ता निर्माण होंगे   वे सिंह  के समान पूरी समस्या को हल कर देंगे । मैंने अपना लक्ष्य निर्धारित कर लिया है और अपना संपूर्ण जीवन उसके लिए समर्पित कर दिया है । यदि में सफलता प्राप्त नहीं कर पाता तो उसे पूरा करने के लिए कोई अन्य आएगा और मुझे संघर्ष  करते रहने में ही संतोष प्राप्त होगा ।

★ प्रत्येक व्यक्ति, प्रत्येक राष्ट्र को महान होने के लिए निम्नलिखित तीन बातों की आवश्यकता है-
1. अच्छाई की शक्तियों पर दृढ़ विश्वास
2. ईर्ष्या और संदेह का अभाव
3. उन सभी की सहायता करना जो अच्छे बने ने तथा अच्छा कार्य करने का प्रयत्न करते हैं।


★ आओ हम एक महान ध्येय को अपनाएं और उसके लिए अपना जीवन समर्पित कर दें ।

★ सिंह के पोरूष से युक्त, परमात्मा के प्रति अटूट निष्ठा से संपन्न और पावित्र्य की भावना से उद्दीप्त सहसो नर - नारी , दरिद्रो एवं उपेक्षितो के प्रति हार्दिक सहानुभूति लेकर देश के एक कोने से दूसरे कोने तक भ्रमण करते हुए मुक्ति का , सामाजिक पुनरुत्थान का, सहयोग और समता का संदेश देंगे

★ कोई कार्य तुच्छ नहीं। यदि मनपसंद कार्य मिल जाए तो मूर्ख भी उसे पूरा कर सकता है, किंतु बुद्धिमान पुरुष भाई है जो प्रत्येक कार्य को अपने लिए रुचिकर बना ले।

★    उत्तिष्ठत! निर्भीक बनो,  समर्थ बनो । संपूर्ण उत्तरदायित्व अपने कंधों पर संभालो और  समझ लो कि तुम ही अपने भाग्य विधाता हो । जितनी शक्ति और सहायता तुम्हें चाहिए , वह सब तुम्हारे अंदर ही है । अतः अपना भविष्य स्वयं बनाओ।

★ आत्म -नियंत्रण के द्वारा वह प्रबल इच्छा- शक्ति व चारित्र्य पैदा होते हैं जिनमें से ईशा और बुद्ध पैदा होते हैं।



★ जिसमें अपने विश्वास नहीं है वहीं नास्तिक है। प्राचीन धर्मों में कहा गया है , जो ईश्वर में विश्वास नहीं करता वह नास्तिक है । नूतन धर्म कहता है , जो आत्मविश्वास नहीं रखता वही नास्तिक है ।

कभी 'नहीं' कहना 'मैं नहीं कर सकता' यह कभी ना कहना । ऐसा कभी नहीं हो सकता, क्योंकि तुम अनंतस्वरूप हो । तुम्हारे स्वरूप की तुलना में देश - काल भी कुछ नहीं  है। जो इच्छा होगी वही कर सकते हो , तुम सर्वशक्तिमान हो ।

★ कुछ भी करो, अपना पूरा मन ,जी और प्राण उसमें लगा दो । मेरी एक बार एक सन्यासी से भेंट हुई थी - बड़े सन्यासी थे।  वे अपने भोजन के पीतल के बर्तन ऐसे चमकाते थे कि सोने जैसे दमकने  लगते थे। और यह कार्य वे उतनी ही सावधानी और तन्मयता से करते थे जैसे अपना पूजन और जप ध्यान ।

★ दुनिया तभी पवित्र और अच्छी हो सकती है , जब हम स्वयं पवित्र और अच्छे हो । वह हैं कार्य और हम हैं उसके कारण। इसलिए आओ, हम अपने आप को पवित्र बना ले । आओ, हम अपने आप को पूर्ण बनाएं।

★   संस्कृत में कहावत है - 'जो कापुरुष और मूर्ख है, वह कहता है यह भाग्य है ।' लेकिन वह बलवान पुरुष है, जो खड़ा हो जाता है और कहता है, "मैं अपने भाग्य का निर्माण करूंगा ।"

★ केवल शिक्षा! शिक्षा! शिक्षा! यूरोप के बहुतेरे नगरों में घूमकर और वहां के गरीबों के भी अमन-चैन और विद्या को देखकर हमारे गरीबों की बात याद आती थी और मैं आंसू बहाता था। यह अंतर क्यों हुआ ? जवाब पाया - शिक्षा !

★ पवित्रता ,धैर्य और अध्यवसाय ,इन्हीं तीनों गुणों से सफलता मिलती है और सर्वोपरि है प्रेम ।

★ स्त्रियां जब शिक्षित होगी , तभी तो उनकी संतानों द्वारा देश का मुख् उज्जवल होगा और देश में विद्या, ज्ञान ,शक्ति ,भक्ति जाग उठेगी।

★ हमारा पवित्र भारतवर्ष धर्म एवं दर्शन की पुण्य भूमि है । यहीं बड़े-बड़े महात्माओं तथा ऋषियों का जन्म हुआ है , यही सन्यास एवं त्याग की भूमि है तथा यही केवल यही आदि काल से लेकर आज तक मनुष्य के लिए जीवन के सर्वोच्च आदर्श एवं मुक्ति का द्वार खुला हुआ है।

★   विश्वास - विश्वास ! अपने आप पर विश्वास, परमात्मा के ऊपर विश्वास - यही उन्नति का एकमात्र उपाय है ।

★ मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि कपट से जगत में कोई महान कार्य नहीं होता ।

★ धर्म मतवाद या बौद्धिक तर्क में नहीं , वरन आत्मा के ब्रहत्व को जान लेना ,  तद्रुप हो  जाना उसका साक्षात्कार, यही धर्म है।


             !! ओम शांति: शांति: शांति:!!

Sunday, 15 March 2020

युवा पीढ़ी को स्वामी जी का संदेश ( Swamiji's message to the younger generation) part 1

*इस देश का पुनरुत्थान युवाओं*               *द्वारा होगा।*

नवयुवको, तुम्हारे ऊपर ही मेरी आशा है । क्या तुम अपनी जाति और राष्ट्र की पुकार सुनोगे ? यदि तुम्हें मुझ पर विश्वास है तो मैं कहूंगा कि तुम में से प्रत्येक का भविष्य उज्जवल है । मेरा विश्वास युवा पीढ़ी में , नयी पीढ़ी में है, मेरे कार्यकर्ता उसमें से आएंगे । सिंहों की भांति वे समस्त समस्या का हल निकालेंगे । मैंने अपना आदर्श निर्धारित कर लिया है और उसके लिए अपना समस्त जीवन दे दिया है। यदि मुझे सफलता नहीं मिलती तो मेरे बाद कोई अधिक उपयुक्त व्यक्ति आएगा और इस काम को संभालेगा , और मैं अपना संतोष प्रयत्न करने में ही मानूंगा !
चरित्रवान , बुद्धिमान , दूसरों के लिए सर्वस्व त्यागी तथा आज्ञाकारी युवकों (युवा पीढ़ी) पर ही मेरे भविष्य का कार्य निर्भर है । उन्हीं पर मुझे भरोसा है, जो मेरे भावों को जीवन में परिणत कर अपना और देश का कल्याण करने में जीवनदान कर सकेंगे ।

*एक आदर्श अपनाओ*


एरा भविष्य निश्चित करने का सही समय है। इसीलिए मैं कहता हूं कि अभी इस भरी जवानी में, इस नये  जोश के जमाने में ही काम करो , जीर्ण शिर्ण हो जाने पर काम नहीं होगा । काम करो, क्योंकि काम करने का सही समय है । सबसे अधिक ताजे , बिना स्पर्श किए हुए वह बिना  सुंघे फूल ही भगवान के चरणों पर चढ़ाए जाते हैं और वे उसे ही ग्रहण करते हैं । अपने पैरों पर खड़े हो जाओ , देर न करो , क्योंकि जीवन क्षणस्थायी है।....... अपनी जाति, देश, राष्ट्र और समग्र मानव समाज के कल्याण के लिए आत्मोत्सर्ग करना सीखो ।...... आओ , हम अपने आगे एक महान आदर्श खड़ा करें और उसके लिए अपना जीवन उत्सर्ग कर दें ।

*आत्मनिर्भरता *


तेरे भीतर अदम्य शक्ति है । तू तो 'मैं कुछ नहीं' सोच कर वीर्यविहीन बना जा रहा है।...... आगे बढ़ो! सैकड़ों युगों के उद्यम से चरित्र का गठन होता है । निराश ना होओ । सत्य के एक शब्द का भी लोप  नहीं हो सकता । यदि दीर्घकाल तक कूड़े के नीचे भले ही दबा पड़ा रहे, परंतु देर  या सवेर वह प्रकट होगा ही । सत्य  अनश्वर है , पुण्य अनश्वर है। पवित्रता  अनश्वर हैं। मुझे सच्चे मनुष्य की आवश्यकता है , मुझे शंख - ढ़पोर चेले नहीं चाहिए। मेरे बच्चे, दृढ़ रहो । कोई आकर तुम्हारी सहायता करेगा , इसका भरोसा ना करो।..... आत्मनिर्भर बनो ।
पहले अपने में अंतर्निहित आग में शक्ति को जागृत कर , फिर देश के समस्त व्यक्तियों में जितना संभव हो, उस शक्ति के प्रति विश्वास जगाओ।

*आत्मविशवास *


इच्छाशक्ति संसार में सबसे अधिक बलवती है। उसके सामने दुनिया की कोई चीज नहीं ठहर सकती । क्योंकि वह भगवान - साक्षात भगवान से आती है। विशुद्ध दृढ़ इच्छाशक्ति सर्वशक्तिमान है। क्या तुम इसमें विश्वास नहीं करते ?
आज हम जो चाहते हैं , वह हैं - बल , अपने में अटूट विश्वास। हमें पुनः एक बात सच्ची श्रद्धा को जगाना होगा, तभी आज देश के सामने जो समस्याएं हैं, उनका समाधान स्वयं हमारे द्वारा हो सकेगा ।
शक्ति क्या कोई दूसरा देता है? वह तेरे भीतर ही मौजूद है । समय आने पर वह स्वयं ही प्रकट होगी। तो काम में लग जा, फिर देखेगा , इतनी शक्ति आएगी कि तू उसे संभाल न सकेगा। दूसरों के लिए रत्ती भर काम करने से भीतर की शक्ति जाग उठती है। दूसरों के लिए रत्ती भर सोचने से धीरे-धीरे ह्रदय में सिंह सा बल आ जाता है। तुम लोगों से में इतना स्नेह करता हूं परंतु तुम लोग दूसरों के लिए परिश्रम करते - करते मर भी जाओ तो भी यह देखकर मुझे प्रशंसा ही होगी।
हमारे देश के लिए इस समय आवश्यकता है , लोहे की तरह ठोस मांसपेशियों और मजबूत स्नायुवाले शरीरों की । आवश्यकता है इस तरह के दृढ़ इच्छाशक्ति संपन्न होने की कि कोई उसका प्रतिरोध करने में समर्थ ना हो । ........हमें जो चाहिए वह है शक्ति। इसलिए स्वयं पर विश्वास रखो । अपनी नसों को ताकतवर बनाओ । हमें चाहिए लोहे की मांसपेशियां और स्टील की नसें। हम बहुत रो लिए, अब और नहीं । अपने पैरों पर दृढ़ता से खड़े हो जाओ और और मनुष्य बनो ।........... कोई कुछ भी कहे, अपने विश्वास में दृढ़ रहो - दुनिया तुम्हारे पैरों तले आ जाएगी । अपने आप पर विश्वास करो, सब शक्ति तुम मैं हैं , इसे जान लो प्रकट करो ।

Saturday, 14 March 2020

उदार बनो : सेवा करो ( Be generous: serve)

स्वामी विवेकानंद द्वारा लिखा गया सफलता का दसवां व अंतिम सूत्र
स्वामी विवेकानंद का यह संदेश, मन और मस्तिष्क की अंतर्द्वंद  की स्थिति में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा क्योंकि वे कहते हैं "जब कभी मन (अंतः करण) और मस्तिष्क (चेतना बुद्धि) में अंतर्द्वंद हो तो मन का अनुसरण करो। यह कल हृदय ही है , जो किसी को भी उन सर्वोच्च ऊंचाई तक ले जा सकता है। दूसरों के लिए किया गया कर्म ही मन को संतोष देता है । जीवन में सुखी, शांत और संतुष्ट रहना है तो उदार बनो और जरूरतमंदों की सेवा करो । पीड़ित मानवता की सेवा हमेशा हमें शांत , सज्जन और सुखी बना सकती है । जीवन में दूसरों की सेवा एक ऐसा प्रकल्प है जिससे व्यक्ति के रूप में द्वेष, ईर्ष्या  या दुर्भावना और बेर का हास होता है।



स्वामी विवेकानंद सच्चे कर्मयोगी थे । उन्होंने गरीबों के दुख दूर करने के विशेष प्रयोजन के लिए जन्म लिया था और इसका उन्होंने अंतिम श्वास तक अनवरत निर्वहन भी किया । वे कहते हैं  "नर सेवा ही नारायण सेवा है"। ईश्वर से साक्षात्कार  प्रत्येक मनुष्य के जीवन में संभव नहीं, किंतु यदि कोई मनुष्य पीड़ित मानव की मन पूर्वक सेवा का कार्य करता है तो उसे ईश्वर दर्शन के सुख- संतोष की सहज प्राप्ति हो जाएगी।  पीड़ित मानव की सेवा ही, ईश्वर की सच्ची आराधना है। निस्वार्थ भाव से दूसरों के लिए किया गया कार्य तन और मन दोनों को पवित्र करता है और मनुष्य को ईश्वर के निकट लाता है । मन की पवित्रता ही शांति और आनंद देती है । शांति और आनंदपूर्वक ही हम जीवन के लक्ष्य को सफलतापूर्वक प्राप्त कर सकते हैं । इस भौतिक युग में जीविकोपार्जन के लिए हम जितने भी व्यस्त हो , कहीं कुछ समय पीड़ित मानव की सेवा के लिए अवश्य निकालें । जीवन- पथ पर तभी हमको असीम आत्मिक सुख प्राप्त हो सकेगा। सत् लक्ष्य की प्राप्ति के लिए यह एक महत्वपूर्ण कारगर सूत्र है- ' उदार बनो  और पीड़ित मानव की सेवा करो ।'

Friday, 13 March 2020

दूसरों को दोष मत दो ( Don't blame others )


स्वामी विवेकानंद जी द्वारा लिखा गया सफलता का आठवां सूत्र

स्वामी विवेकानंद कहते हैं - "कभी भी दूसरों की कमियों के विषय में बात मत करो । वे कितने भी बुरे हो , इससे कोई फर्क नहीं पड़ता,  इससे कुछ हासिल होने वाला नहीं है । तुम किसी के दोष गिनाकर  उसकी मदद नहीं कर सकते , तुम उसे भी चोट पहुंचाते हो और साथ ही स्वयं को भी।" इसलिए इसे ठीक से समझ कर अपनाना है - 
दूसरों को दोष मत दो।  अपनी असफलता के लिए दूसरों को दोष देना, एक सामान्य मानवीय प्रवृत्ति है ।
विवेकानंद कहते हैं - "मैं दृढ़तापूर्वक विश्वास दिलाना चाहता हूं कि कोई भी व्यक्ति दूसरों को गाली देने से कभी आगे नहीं बढ़ सकता, वरण वह प्रशंसा करके उन्नति प्राप्त कर सकता है । यही राष्ट्रों पर भी लागू होता है । स्वामी विवेकानंद का यह सूत्र - "अपनी गलतियों के लिए दूसरों को दोष मत दो , अपने पैरों पर खड़े हो जाओ, सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले लो।"

दोषारोपण का नकारात्मक व्यवहार , आत्म निरीक्षण करने और असफलताओं के प्रति सुधारात्मक कदम बढ़ाने से रोकता है । स्वयं या अपने मित्रों की सहायता से जीवन नौका के उन हानिकारक छिद्रों को ढूंढ कर उन्हें बंद कर सके ताकि असफलताओं के सागर में डूबने से बच सकें।  नकारात्मक ऊर्जा कभी भी उन्नति की ओर नहीं ले जा सकती हैं,  वह पतन की ओर धकेलती है । ध्येय प्राप्ति का मार्ग हमेशा सकारात्मक सोच से ही आगे बढ़ता है ।


स्वामी विवेकानंद जी ने कहा है - "असफलताओं की चिंता मत करो, वह बिलकुल स्वाभाविक है, वे असफलताएं जीवन का सौंदर्य है । जीवन में यदि संघर्ष ने रहे तो मनुष्य जीवन व्यर्थ है। संघर्ष, त्रुटियों और असफलताओ की परवाह मत करो, यह छोटी-छोटी फिसलने है। अपने आप पर विश्वास का आदर्श सामने रखकर सदैव आगे बढ़ने का प्रयास करो । यदि एक हजार बार भी असफल होते हो , तो एक बार फिर सफल होने के लिए प्रयत्न करो ।"


9. स्वाभिमानी बनो

स्वामी विवेकानंद जी द्वारा लिखा गया सफलता का नवा सूत्र


जीवन में आगे बढ़ना है , लक्ष्य को प्राप्त करना है तो इसे भी याद रखना होगा। 'स्वाभिमानी बनो'। अपने स्वाभिमान को हर प्रकार से बनाए रखना है। विनम्रता चरित्र का एक उत्तम गुण हैं, किंतु आत्म सम्मान की कीमत पर नहीं। सर्वप्रथम आत्म सम्मान ही होना चाहिए, फिर विनम्रता, आदर और अन्य सभी चारित्रिक गुण व्यवहार में आने चाहिए। आत्म सम्मान को खोकर विनम्र बने रहना कायरता है । मानवता का सर्वोच्च गुण है - स्वाभिमान ! स्वाभिमान को छोड़कर कोई भी व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं बन सकता, कहीं भी वह सफल नहीं हो सकता, किसी भी स्थान पर प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं कर सकता।

अपमान सहना विनम्रता नहीं, कायरता है और कायरता कभी भी उच्च गुण नहीं हो सकती। यह सत्य है कि हमारे मन में किसी को भी हानि पहुंचाने की चेष्टा कभी ना हो , किंतु यह भी सत्य है कि हमारे स्वाभिमान को ठेस पहुंचाने वाले को सबक सिखाएं मिलना भी नहीं छोड़ना चाहिए। चुपचाप सहने की प्रवृत्ति दूसरों को अपमान की छूट दे देती है और यही आगे बढ़कर हमारे आत्मसम्मान को लील जाती है।  इसलिए जीवन में जितनी भी कठिन राह हो , मंजिल तक पहुंचना है तो  स्वभिमान के साथ । कहीं भी, कभी भी , किसी भी परिस्थिति में आत्म सम्मान को कभी मत छोड़ो । स्वामी विवेकानंद का यही सूत्र हैं - "स्वाभिमानी बनो , आत्मसम्मान की सदैव रक्षा करो ।


Thursday, 12 March 2020

राष्ट्रीय सेवा का कर्तव्य निभाओ ( Perform the duty of service to the nation)


स्वामी विवेकानंद द्वारा लिखा गया सफलता का सातवा सूत्र


भगिनी निवेदिता ने लिखा है - "भारत ही स्वामी जी का हृदय में धड़कता था , भारत ही उनकी धमनियों में प्रवाहित होता था, भारत ही उनका एकमात्र स्वप्न था और भारत ही उनकी सनक थी ।" वह भारत के प्रति उनका असीम प्रेम ही है जिसके कारण विवेकानंद भारत के पर्याय बन गए और शायद इसीलिए रविंद्र नाथ टैगोर ने भी लिखा है "भारत को जानना है तो स्वामी विवेकानंद को पढ़ो।"


देश के कर्णधार नेतृत्व से लेकर आमजन तक सभी स्वार्थ की दौड़ में अंधे  होकर भाग रहे हैं। उन्हें तलाश है सुख की , वैभव की,  ऐश्वर्य की।  प्रत्येक मनुष्य इस भौतिकवादी युग की प्रत्येक वस्तु को हासिल कर लेना चाहता है । स्वामी जी ने धर्म और अन्य सब कुछ से ऊपर देश सेवा को माना है । और इसीलिए वह प्रश्न करते हैं - "क्या भारत मर जाएगा? नहीं भारत नहीं मर सकता । भारत ने सदैव विश्व को मान्यता का संदेश दिया है ,  तो क्या आज हम स्वयं ही मानवीय संवेदनाओं को भूल जाएंगे? भारत की आत्मा और गौरव को बचाने के लिए हमें राष्ट्र सेवा का संकल्प लेना होगा।  देश और देशवासियों की सेवा ही हमारा परम कर्तव्य है।  प्रत्येक भारतवासी को चाहिए कि वह राष्ट्र सेवा का कर्तव्य निभाएं।  प्रत्येक मनुष्य और राष्ट्र  को महान बनाने के लिए तीन चीजें आवश्यक है - 'सदाचार की शक्ति में विश्वास, ईर्ष्या व संदह का परीत्याग और  जो सत बनने या सत्कर्म करने के लिए यत्न वान हो , उनकी सहायता करना ।"

स्वामी जी कहते हैं - "देश भक्त बनो , जिस राष्ट्र ने अतीत में हमारे लिए इतने बड़े-बड़े काम किए हैं, उसे प्राणों से भी प्यारा समझो !..........  भारत तभी जागेगा , जब विशाल हृदय वाले सैकड़ों स्त्री-पुरुषों , भोग विलास और सुख की सभी इच्छाओं को विसर्जित कर मन , वचन और शरीर से उन करोड़ों भारतीयों के हित के लिए स सचेष्ट होंगे जो दरिद्रता तथा मूर्खता के अज्ञात सागर में निरंतर डूबते जा रहे हैं ।" समर्थ राष्ट्र में ही युवा पीढ़ी का भविष्य उज्जवल बन सकता है और साथ ही इसे भी समझना होगा कि राष्ट्र को  समर्थ बनाने में  युवाओं की ही महती भूमिका होती है । इसलिए विश्व में सर्वाधिक युवा जनसंख्या वाले अपने भारत को उन्नत बनाने के लिए युवा पीढ़ी को ही आगे आना होगा ।
भारत का राष्ट्रीय आदर्श है  -त्याग और सेवा ! प्रत्येक नागरिक को अपनी आय का कुछ भाग देश सेवा में समर्पित करना चाहिए। तन, मन और धन से हम राष्ट्र सेवा के प्रति योगदान करेंगे तो भारत विश्व में सिरमौर बनेगा ।



              English translation




7. Perform the duty of service to the nation


The seventh formula of success written by Swami Vivekananda 


Bhagini Nivedita has written - "India was the heartbeat of Swamiji, India flowed in his arteries, India was his only dream and India was his craze." It is his unending love for India that has made Vivekananda synonymous with India and perhaps That is why Ravindra Nath Tagore also wrote, "If you want to know India, read Swami Vivekananda."
Everyone from the leadership of the country to the common man is running blindly in the race for selfishness. They seek happiness, splendor, splendor. Every human wants to acquire everything in this materialistic era. Swamiji has considered country service above religion and everything else. And that's why they ask "Will India die? No India cannot die. India has always given a message of recognition to the world, so what . Today we ourselves forget human sensations? To save the soul and pride of India, we have to take a pledge to serve the nation. Country And serving the countrymen is our ultimate duty. Every Indian should perform the duty of service to the nation. Three things are necessary to make every man and nation great -Believing in the power of virtue, abandoning jealousy and contempt, and helping those who are diligent to become truth or to do truth. "

Swamiji says - "Be a patriot, consider the nation that has done so many great things for us in the past, even more than life! ........ India  Only when awake hundreds of men and women with huge heart, immerse all desires of enjoyment and pleasure from mind, speech and body  Millions will be conscious of the interest of Indians who are constantly drowning in the unknown sea of ​​poverty and stupidity. "In a capable nation, the future of the young generation can be bright and at the same time  It has to be understood that youths have an important role in enabling the nation. Therefore, only the young generation will have to come forward to improve their India with the largest young population in the world.

India's national motto is resignation and service! Every citizen should devote some part of his income to the country service. If we contribute towards national service with body, mind and money, India will become the best in the world.