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Monday, 16 March 2020

स्वामी विवेकानंद की ओजस्वी वाणी ( Swami Vivekananda's powerful voice)


★  हम प्रत्येक आत्मा का आहवान करें , उत्तिष्ठत! जाग्रत !! प्राप्य वरान्निबोधत !!! अर्थात उठो, जागो और जब तक लक्ष्य प्राप्त ना कर लो , कहीं मत ठहरो। उठो! जागो!! दोबल्य के मोहजाल से निकलो, कोई वास्तव में दुर्बल नहीं है। आत्मा अनंत, सर्वशक्तिमान एवम् सर्वव्यापी है। खड़े हो, स्वयं को झकझोरो, अपने अंदर व्याप्त ईश्वर का आह्वान करो । उसकी सत्ता को अस्वीकार मत करो । अपनी जाति पर बहुत अधिक निष्क्रियता , बहुत अधिक दुर्बलता और बहुत अधिक माहजाल छाया रहा है और अब भी है।


★ओ वीर पुरुष ! साहस बटोर,  निर्भीक बन और गर्व  कर कि तू भारतवासी हैं। गर्व से घोषणा कर की ''में भारतवासियों हूं, प्रत्येक भारतवासी मेरा भाई है ।

★ मेरे भाई ! कह - "भारत की मिट्टी मेरा स्वर्ग है, भारत के कल्याण में ही मेरा कल्याण है ।"  अहोरात्र जपा कर , "हे गोरीनाथ ! हे जगदंबे ! मुझे मनुष्यत्व  दो। हे  शक्तिमयी माँ !मेरी दुर्बलता को हर लो; मेरी कालपुरुषता को दूर भगा दो और मुझे मनुष्य बना दो , माँ।"

अपने सुखों की, आनंदो कि , अपने यश की,  प्रतिष्ठा कि , यहां तक कि अपने प्राणों की भी आहूति दो और मानव आत्माओं का ऐसा सेतु बांध दो, जिस पर होकर यह करोड़ों नर नारी भवसागर को पार कर जाए । 'सत्य' की समस्त कठिनाइयों को एकत्र करो । यह चिंता मत करो कि तुम किस पताका के नीचे चल रहे हो । यह भी चिंता मत करो कि तुम्हारा वर्ण क्या है - लाल, हरा या नीला; बल्कि सब वर्णों को मिला दो और स्नेह के प्रतीक श्वेत रंग का प्रखर तेज उत्पन्न करो । हम केवल कर्म करें । परिणाम अपनी चिंता स्वयं करेंगे।

★ मैं भविष्यदृष्टा नहीं हूं ; न मैं उसके लिए चिंतित हूं ; किंतु, एक दृश्य मेरे सामने बिल्कुल स्पष्ट है कि  हमारी प्राचीन भारत मातृभूमि फिर एक बार जग उठी है। वह नवयौवन प्राप्त कर पहले से कहीं अधिक भव्य दीप्ति के साथ अपने सिंहासन पर बैठी हुई है । समस्त संसार को शांतिपूर्ण और मंगलमय वाणी से उसका संदेश सुनाओ ।

★ हमें खून में तेजी और स्नायुओं में बल की आवश्यकता है - लोहे की भुजाएं  और फौलाद के स्नायु चाहिए , ना की दुर्बलता लाने वाले निरर्थक विचार ।

★ यदि भारत को महान बनाना है , इसका भविष्य उज्जवल बनाना है , तो इसके लिए आवश्यकता है संगठन करने की और बिखरी हुई इच्छाशक्तियों को एकत्र करने की ।


★ मनुष्ययों की, केवल मनुष्यों की आवश्यकता है। और सब कुछ हो जाएगा ,किंतु आवश्यकता है वीर्य वान, तेजस्वी, श्रीसंपन्न और पूर्ण प्रमाणिक नव युवकों कि । मेरी आशाएं इस नवोदित पीढ़ी में, आधुनिक पीढ़ी में केंद्रीत है। उसी में से मेरे कार्यकर्ता निर्माण होंगे   वे सिंह  के समान पूरी समस्या को हल कर देंगे । मैंने अपना लक्ष्य निर्धारित कर लिया है और अपना संपूर्ण जीवन उसके लिए समर्पित कर दिया है । यदि में सफलता प्राप्त नहीं कर पाता तो उसे पूरा करने के लिए कोई अन्य आएगा और मुझे संघर्ष  करते रहने में ही संतोष प्राप्त होगा ।

★ प्रत्येक व्यक्ति, प्रत्येक राष्ट्र को महान होने के लिए निम्नलिखित तीन बातों की आवश्यकता है-
1. अच्छाई की शक्तियों पर दृढ़ विश्वास
2. ईर्ष्या और संदेह का अभाव
3. उन सभी की सहायता करना जो अच्छे बने ने तथा अच्छा कार्य करने का प्रयत्न करते हैं।


★ आओ हम एक महान ध्येय को अपनाएं और उसके लिए अपना जीवन समर्पित कर दें ।

★ सिंह के पोरूष से युक्त, परमात्मा के प्रति अटूट निष्ठा से संपन्न और पावित्र्य की भावना से उद्दीप्त सहसो नर - नारी , दरिद्रो एवं उपेक्षितो के प्रति हार्दिक सहानुभूति लेकर देश के एक कोने से दूसरे कोने तक भ्रमण करते हुए मुक्ति का , सामाजिक पुनरुत्थान का, सहयोग और समता का संदेश देंगे

★ कोई कार्य तुच्छ नहीं। यदि मनपसंद कार्य मिल जाए तो मूर्ख भी उसे पूरा कर सकता है, किंतु बुद्धिमान पुरुष भाई है जो प्रत्येक कार्य को अपने लिए रुचिकर बना ले।

★    उत्तिष्ठत! निर्भीक बनो,  समर्थ बनो । संपूर्ण उत्तरदायित्व अपने कंधों पर संभालो और  समझ लो कि तुम ही अपने भाग्य विधाता हो । जितनी शक्ति और सहायता तुम्हें चाहिए , वह सब तुम्हारे अंदर ही है । अतः अपना भविष्य स्वयं बनाओ।

★ आत्म -नियंत्रण के द्वारा वह प्रबल इच्छा- शक्ति व चारित्र्य पैदा होते हैं जिनमें से ईशा और बुद्ध पैदा होते हैं।



★ जिसमें अपने विश्वास नहीं है वहीं नास्तिक है। प्राचीन धर्मों में कहा गया है , जो ईश्वर में विश्वास नहीं करता वह नास्तिक है । नूतन धर्म कहता है , जो आत्मविश्वास नहीं रखता वही नास्तिक है ।

कभी 'नहीं' कहना 'मैं नहीं कर सकता' यह कभी ना कहना । ऐसा कभी नहीं हो सकता, क्योंकि तुम अनंतस्वरूप हो । तुम्हारे स्वरूप की तुलना में देश - काल भी कुछ नहीं  है। जो इच्छा होगी वही कर सकते हो , तुम सर्वशक्तिमान हो ।

★ कुछ भी करो, अपना पूरा मन ,जी और प्राण उसमें लगा दो । मेरी एक बार एक सन्यासी से भेंट हुई थी - बड़े सन्यासी थे।  वे अपने भोजन के पीतल के बर्तन ऐसे चमकाते थे कि सोने जैसे दमकने  लगते थे। और यह कार्य वे उतनी ही सावधानी और तन्मयता से करते थे जैसे अपना पूजन और जप ध्यान ।

★ दुनिया तभी पवित्र और अच्छी हो सकती है , जब हम स्वयं पवित्र और अच्छे हो । वह हैं कार्य और हम हैं उसके कारण। इसलिए आओ, हम अपने आप को पवित्र बना ले । आओ, हम अपने आप को पूर्ण बनाएं।

★   संस्कृत में कहावत है - 'जो कापुरुष और मूर्ख है, वह कहता है यह भाग्य है ।' लेकिन वह बलवान पुरुष है, जो खड़ा हो जाता है और कहता है, "मैं अपने भाग्य का निर्माण करूंगा ।"

★ केवल शिक्षा! शिक्षा! शिक्षा! यूरोप के बहुतेरे नगरों में घूमकर और वहां के गरीबों के भी अमन-चैन और विद्या को देखकर हमारे गरीबों की बात याद आती थी और मैं आंसू बहाता था। यह अंतर क्यों हुआ ? जवाब पाया - शिक्षा !

★ पवित्रता ,धैर्य और अध्यवसाय ,इन्हीं तीनों गुणों से सफलता मिलती है और सर्वोपरि है प्रेम ।

★ स्त्रियां जब शिक्षित होगी , तभी तो उनकी संतानों द्वारा देश का मुख् उज्जवल होगा और देश में विद्या, ज्ञान ,शक्ति ,भक्ति जाग उठेगी।

★ हमारा पवित्र भारतवर्ष धर्म एवं दर्शन की पुण्य भूमि है । यहीं बड़े-बड़े महात्माओं तथा ऋषियों का जन्म हुआ है , यही सन्यास एवं त्याग की भूमि है तथा यही केवल यही आदि काल से लेकर आज तक मनुष्य के लिए जीवन के सर्वोच्च आदर्श एवं मुक्ति का द्वार खुला हुआ है।

★   विश्वास - विश्वास ! अपने आप पर विश्वास, परमात्मा के ऊपर विश्वास - यही उन्नति का एकमात्र उपाय है ।

★ मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि कपट से जगत में कोई महान कार्य नहीं होता ।

★ धर्म मतवाद या बौद्धिक तर्क में नहीं , वरन आत्मा के ब्रहत्व को जान लेना ,  तद्रुप हो  जाना उसका साक्षात्कार, यही धर्म है।


             !! ओम शांति: शांति: शांति:!!

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