BLOG

Friday, 19 June 2020

रेल चली हैं। ( The train has run. )



छुक छुक करती रेल चली
सरगम भरती रेल चली।
उत्तर से दक्षिण को जाती
पूरब - पश्चिम जाती - आती ।

रुकने का तो नाम नहीं है
थकने का भी काम नहीं है ।
चलती है, बस चलती जाती
सबको यहां वहां पहुंचाती ।

मिलते कितने दृश्य सुहाने
लगे देखकर मन ललचाने
दूर-दूर तक हरियाली है
खुशहाली - ही - खुशहाली है ।


पर्वत - घाटी, नदिया - नालें
नैहरे कहीं, कहीं है खाले।
मगर कहीं पर धरती प्यासी
कहीं हताशा, कहीं उदासी ।

देश देश के लोग मिलेंगे
वेश - वेश में लोग मिलेंगे।
सबकी अपनी भाषा - बोली
मिलकर करते हंसी - ठिठोली ।

अपनी - अपनी मंजिल सबकी
अपनी - अपनी महफिल सबकी।
जीवन के सब रंग अलग है
भोजन के सब ढंग अलग हैं ।


कोई खाए इडली - डोसा।
कोई चाहे चाट - समोसा
कोई रोटी - चावल खाता।
कुछ को दही- पराठा भाता।

जनता, नेता, वर्दीधारी
सभी रेल की करे सवारी।
बड़े अनूठे खेल रेल के
जोड़ रही है तालमेल के

खान-पान या चना - चबेना
किसी और से कभी ना लेना।
सब को देखो , सब को जानो
कहना सदा बड़ों का मानो ।

सीखो सब - कुछ खेल - खेल में
टिकट खरीदो, चढ़ो रेल में ।
टीटी आए टिकट दिखाना
नियम यही सब को समझाना।

रेल सभी को ढ़ोती बच्चों
रेल सभी की होती बच्चों ।
रखो इसमें सदा सफाई
अच्छी बात यही है भाई ।

दुनिया यूं ही चलती जाती
रेल यही हमको समझाती।
प्रेम भाव के साथ निभाओ
जब तक जीवन चलते जाओ ।

आशा करता हूं यह कविता आपको पसंद आएगी इस लोकडाउन में बेहतर कविताएं पढ़ने का आपको और मौका मिलेगा इस मोटिवेशन चैनल को अपनी ईमेल आईडी डालकर subscribe  करे ।और हमारी अगली पोस्ट का इंतजार करें ।

।।जय हिन्द जय भारत।।

No comments:

Post a Comment