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Wednesday, 1 April 2020

शिक्षा और नैतिक मूल्य (Education and moral values)



मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है । सही अर्थों में मनुष्य एवं समाज एक दूसरे पर अवलंबित है । मनुष्य का मनुष्य के रूप में अस्तित्व समाज के आधार पर ही निर्भर है । वर्तमान में हमारे सामाजिक जीवन को असंतोष, अराजकता आदि में ने ग्रस्त रखा है । व्यक्तिगत स्तर पर जातिवाद, भाषावाद, क्षेत्रवाद, हिंसा इत्यादि ने मनुष्य के मन- मस्तिष्क पर नकारात्मक प्रभाव डाल रखा है जिससे न केवल व्यक्तिगत अपितु सामाजिक जीवन भी प्रभावित हो रहा है, ऐसे में जन्म से मृत्यु तक की यात्रा असंतोष व भटकाव से प्रभावित होकर कष्टदायक हो रही है । समाज की प्रगति, शांति एवं समृद्धि के लिए हमें इन दुर्बलता एवं विकृतियों की ओर ध्यान देना पड़ेगा, इस हेतु शिक्षा एक उपयुक्त माध्यम है इसे स्वीकार करते हुए हमारी शिक्षा में मूल्य - शिक्षा का समावेश आवश्यक है ।


वस्तुत: व्यक्ति एवं समाज के निर्माण में शिक्षा का महत्वपूर्ण योगदान है, प्राचीन काल में प्रचलित गुरुकुल - पद्धति ने भारत को अनेक आदर्श प्रदान किए व भारत विश्व - पटल पर एक सभ्य, सुसंस्कृत व अनुकरणीय राष्ट्र के रूप में जाना गया । व्यक्ति का बौद्धिक व चारित्रिक निर्माण उपलब्ध शिक्षा व्यवस्था पर निर्भर करता है ।


शिक्षा में विज्ञान, तकनीकी, गणित, साहित्य,भूगोल इत्यादि नाना - विध विषयों के अतिरिक्त मूल्य आत्मक चेतना का समावेश भी आवश्यक है,  मूलत: किसी वस्तु अथवा विषय की आवश्यकता अथवा महत्व ही मूल्य कहलाता है । मूल्यविहीन शिक्षा - व्यवस्था कई प्रकार की समस्याओं का कारण है । स्वामी विवेकानंद के अनुसार "यदि राष्ट्र शिक्षा से संपन्न होता तो हम पराभूत मन: स्थिति में ना आए होते," अपने देश में शिक्षा के अभाव ने अत्यधिक नुकसान किया है । शिक्षा और विशेषकर मूल्यपरक शिक्षा के अभाव ने भारत में कई समस्याओं को जन्म दिया है ।


वर्तमान शिक्षा - व्यवस्था कौशल प्रदान कर रही है; किंतु उसके कौशल में मानवीयता कि छाया नहीं दिखाई देती । विद्यार्थियों को अपने समाज एवं राष्ट्र और उससे बढ़कर वैश्विक परिदृश्य में एक संवेदनशील राष्ट्रभक्त नागरिक के रूप में विकसित करने की दिशा में वर्तमान शिक्षा प्रणाली विफल रही है, आज का विद्यार्थी के एक जिम्मेदार नागरिक नहीं बन पा रहा है उसकी सोच में समाज व राष्ट्र की सेवा का चिंतन नहीं है । शिक्षित होकर भी उसे अपनी सामाजिक भूमिका का बोध नहीं है सही मायने में उसे शिक्षा का अर्थ ठीक तरह से नहीं समझाया गया है । वर्तमान शिक्षा पद्धति में यह कहीं नहीं सिखाया जा रहा है कि मनुष्य के जीवन- मूल्य क्या है 'समाज प्रकृति के प्रति उसकी जिम्मेदारियां क्या है,' वह एक सुसंस्कृत नागरिक की भांति अपने देश अपने समाज एवं अपने परिवार के प्रति  अपनी जिम्मेदारियां निभा सकता है  ।


मूल्यपरक शिक्षा का आधार धर्म होता है । प्राचीन काल से ही हमारे समाज में धर्म एवं नैतिक शिक्षा पाठ्यक्रम का अनिवार्य भाग थे और न केवल पाठ्यक्रम में अपितु परिवार के समाज में प्राप्त होने वाले संस्कारों में भी धर्म, परंपरा इत्यादि के माध्यम से सत्य, अहिंसा, दया, अस्तेय, अपरिग्रह, धैर्य इत्यादि इत्यादि के प्रति विशेष आग्रह एवम तदनुसार जीवन जीने के बारे में सिखाया जाता था । यह भारतीय संस्कृति ही है जहां पर "सर्वे भवंतु सुखिनः, सर्वे संतु निरामया: । सर्वे भद्राणि पश्यंतु, मां कश्चित् दु:खभाग भवेत् " की प्रेरणा के साथ शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति अपना विकास करता है ।
भारतीय जीवनदर्शन ने ही उद्घोष किया कि "मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, राष्ट्र देवो भव," अर्थात माता-पिता शिक्षक एवं राष्ट्र ने यह सभी देव तुल्य है । इन जीवन मूल्यों का निरूपण बाल्यकाल से ही घर परिवार तथा विद्यालय के माध्यम से इतना सुंदर भाव से विकसित किया है जिसमें न केवल मनुष्य अपितु संपूर्ण जीव जगत के प्रति मानवीय संवेदनाएं विकसित हो । हमारे यहां पर कहा गया है कि "अष्टादशपुराणेषु व्यास्यस वचनधुयम । परोपकार: पुण्याय परपीड़नम" नैतिक मूल्यों के मूल में परोपकार का भाव आवश्यक है । तुलसीदास जी ने कहा है कि "परहित सरिस धर्म नहिं भाई, परपीड़ा सम नहिं अध्माई "!



फायड ने व्यक्ति के समाजीकरण के बारे में कहा है कि व्यक्ति का व्यवहार अचेतन शक्तियों द्वारा संचालित होता है । उसने id, ego तथा super ego  नामक तीन संबोधन दिए जो स्पष्ट रूप से स्पष्ट रूप से बदलाते जाते हैं कि मनुष्य के मन में उसकी अंतरात्मा पर id तथा super ego  के  पारस्परिक संघर्ष का प्रभाव होता है और उसी प्रक्रिया में मनुष्य अपने व्यक्तित्व का व्यक्तित्व का निर्माण करता है । यदि प्रारंभ से ही व्यक्ति के Id, ego, super ego में उसका परिवेश एक संतुलन स्थापित कर सके जो पारस्परिक सहअस्तित्व स्वीकार्यता को पोषण दें तो शेष जीवनमूल्यों का निरूपण उसके व्यक्तित्व में स्वत: होता है  ।


जीवन मूल्यों को किन्ही शाब्दिक परिधि में बांधना असंभव नहीं तो मुश्किल जरूर है कोई मूल्य विशेष परिस्थितियों में स्वीकार्य एवं सकारात्मक माना जा सकता है तो किन्हीं अन्य परिस्थितियों में अवांछित व अग्राहय माना जा सकता है । गहन चिंतन मनन के पश्चात राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद ने उन, मूल्यों की और मूल्यों की  एक सूची तैयार की है जिन्हें हम नैतिक मूल्य कह सकते हैं । इस सूची में 84 मूल्यों को रखा गया है । कोई भी विचारशील व्यक्ति इस बात से  सहमत होगा कि नैतिक गुणों की कोई एक संपूर्ण सूची नहीं बनाई जा सकती है ।


"आदर्श, अनुशासन, मर्यादा, परिश्रम, इमानदारी और उच्च मानवीय मूल्यों के बिना किसी का जीवन महान नहीं बन सकता !"

                                 __ स्वामी विवेकानंद

                             




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