BLOG

Sunday, 19 April 2020

शिक्षा में मानव - मूल्यों के समावेश द्वारा ही विकास संभव .(Development is possible only through the inclusion of human values ​​in education)



शिक्षा सभी युगों में आवश्यक और महत्वपूर्ण मानी जाती रही है । यह मानव के सफल जीवन के लिए आवश्यक है । इसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती हैं । किसी भी राष्ट्र की समृद्धि शिक्षा के विस्तार व स्तर से प्रभावित होती हैं । जीवन के सभी क्षेत्रों में प्रगति शिक्षा की गुणवत्ता पर निर्भर करती है ।


आज शिक्षा का अर्थ जानकारियों के संग्रह से लिया जाने लगा है । जिसके पास जितनी अधिक जानकारी है वह उतना ही अधिक पढ़ा लिखा माना जाता है । वह पुस्तकों पत्र-पत्रिकाओं को पड़ता है, उससे कुछ निष्कर्ष भी निकालता है किंतु, वह इतने भर से सत्य - असत्य को समझने की शक्ति अथवा समाज - देश के लिए उपयोगी - अनुपयोगी, मानव कल्याण के लिए सार्थक को आदि को समझने के लिए स्वतंत्र चिंतन क्षमता का विकास नहीं हो पाता है । जो जानकारी या ज्ञान प्राप्त किया है उसका मंथन करते हुए सत्य के रास्ते पर चलने की क्षमता विकसित होना आवश्यक है ।

आधुनिक भारत के निर्माता महात्मा गांधी ने शिक्षा के महत्व का वर्णन करते हुए कहा है कि "शिक्षा का लक्ष्य विद्यार्थी को एक आदर्श नागरिक, देशभक्त तथा परिवार, समाज व राष्ट्र के लिए हीरा (रत्न) बनाना है ।" शिक्षा के द्वारा स्वास्थ्य व समृद्ध समाज के लिए योग्य नागरिकों का निर्माण होना चाहिए । पढ़ा लिखा (शिक्षित) व्यक्ति देशभक्त संवेदनशील व चरित्रवान बने । कुशल, प्रवीण व आत्मविश्वास से युक्त हो । दैनंदिन जीवन में ईमानदार, साहसी, दायित्ववान व प्रमाणिक दिखाई दे । बड़ो तथा नारी के प्रति सम्मान व निश्चल दृष्टि तथा बच्चों के प्रति प्रेम का भाव विकसित हो । उसका जीवन नैतिकता, सहयोग की भावना, कर्तव्यपरायणता व आत्मविश्वास जैसे गुणों की सुगंध से महके । इसलिए स्वामी विवेकानंद ने माना कि शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य की अंतर्निहित ही  शक्ति का जागरण है । आत्मा के जागरण द्वारा ही व्यक्ति सार्थक जीवन जीने लायक बनता है । वास्तव में शिक्षा का उद्देश्य इन्हीं मानवीय मूल्यों को व्यक्ति के जीवन में प्रस्फुटित करना है । सामाजिकता, करुणा, मैत्री, दया, विनम्रता, धैर्य, विश्वास, कृतज्ञता, पारदर्शिता, सहयोग, आत्मनिर्भरता जैसे  मानवीय मूल्यों द्वारा ही शिक्षा सार्थक हो सकती है । इन गुणों के अभाव में  एक सभ्य, उदार,  सहअस्तित्व युक्त समाज की कल्पना भी कठिन है । शिक्षा द्वारा ही मानवीय मूल्यों का बीजारोपण संभव है तथा इसके द्वारा ही सभ्य, शांतिप्रिय, सहअसतित्ववादी, समन्वयकारी व  उदार समाज जीवन का निर्माण संभव है ।


आजादी के 70 वर्षों में हमारे देश में शिक्षा का तेजी से विस्तार हुआ है (यद्यपि जितना विस्तार होना था वह नहीं हुआ)!  शिक्षा के विस्तार के साथ समस्याओं में कमी आनी चाहिए थी, किंतु समस्याएं अधिक गंभीर बनी है ।

शिक्षित व्यक्तियों में से एक वर्ग अपने स्वार्थ के लिए देश समाज के प्रति द्रोह करता दिखाई देता है। समाज का एक समूह जो उच्च शिक्षा प्राप्त हैं देश के विरुद्ध संघर्ष करने वाले आतंकवादियों को न केवल सहयोग करता है, वह आतंकवादियों के समूह में सम्मिलित हो जाता है । देश के विरूद्ध नारा लगाता है । भारत के विभाजन की बात करता है ।

नारी की गरिमा में प्रतिष्ठा के स्थान पर शोषण, अपमान व उसके साथ दुराचार की घटनाएं आए दिन पढ़ने को मिलती है । महिलाओं के साथ बलात्कार व हत्या हो जैसी हृदय विदारक घटनाएं बढ़ रही है ।
भ्रष्टाचार अब शिष्टाचार जैसा समझा जाने लगा है। भ्रष्टाचार व्यक्तियों को उतना उद्वेलित नहीं करता जितना करना चाहिए । लाखों करोड़ों के घोटाले करने वाले अपने को शर्मसार अनुभव नहीं करते । येन केन प्रकारेण धन प्राप्त करने की होड़ दिखाई दे रही है । और जिन्होंने अधर्म पूर्वक धन जमा किया है समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त कर रहे हैं । ईमानदारी के साथ है जीवन जिया जा सकता है, इस पर प्रश्न लगाया जा रहा है ।

पराई स्त्री को माता के समान, दूसरों के धन को मिट्टी के समान, सभी में एक ही आत्मा है इस प्रकार के उच्च आदर्श अपनाने वाले व्यक्तियों को ही पंडित अर्थात् शिक्षित मानव मानने वाला समाज आज किस अवस्था में है इसको समझा जा सकता है ।

यह अवस्था क्यों है ? इसका एक मात्र कारण आज की शिक्षा से व्यक्ति मानव मूल्यों को धारण कर संस्कारित नहीं होता है। वे शिक्षा के मंदिरों से अनुशासनहीनता, बड़ों के प्रति असम्मान, संबंधों में स्वच्छंदता, मर्यादाओं का उल्लंघन, परीक्षा पास करने के लिए अनुचित साधनों का उपयोग आदि दुर्गुणों को सीखता है । जब तक हमारी शिक्षा मनुष्य बनाने की (अर्थात मूल्यों की) शिक्षा नहीं देगी तब तक समस्याए बढ़ती ही रहेगी ।

राम व रावण का उदाहरण हमारे सामने है । राम ने शिक्षा द्वारा अपने को संस्कारित किया, मानवीय मूल्यों को जीवन में अपनाया। इस कारण वे एक आदर्श पुरुष बन सके । जीवन के सभी क्षेत्रों में उन्होंने जो प्रतिमान स्थापित किए  उसके कारण आज राम राज्य की स्थापना संभव हो सकी । महात्मा गांधी से एक बार पूछा गया था, आजादी के बाद भारत कैसा होगा तो उन्होंने उत्तर दिया था रामराज्य जैसा होगा । जबकि रावण उच्च कोटि का पंडित होते हुए भी इस तरह का सम्मान प्राप्त नहीं कर सका ।


आशा करता हूं आपको यह पोस्ट पसंद आएगी ।


"चरित्र और शैक्षणिक सुविधाएं ही वह पुंजी है जो माता-पिता अपनी संतान में समान रूप से स्थानांतरित कर सकते हैं ।"

                                   __महात्मा गांधी


रिलेटेड आर्टिकल्स


Wednesday, 1 April 2020

शिक्षा और नैतिक मूल्य (Education and moral values)



मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है । सही अर्थों में मनुष्य एवं समाज एक दूसरे पर अवलंबित है । मनुष्य का मनुष्य के रूप में अस्तित्व समाज के आधार पर ही निर्भर है । वर्तमान में हमारे सामाजिक जीवन को असंतोष, अराजकता आदि में ने ग्रस्त रखा है । व्यक्तिगत स्तर पर जातिवाद, भाषावाद, क्षेत्रवाद, हिंसा इत्यादि ने मनुष्य के मन- मस्तिष्क पर नकारात्मक प्रभाव डाल रखा है जिससे न केवल व्यक्तिगत अपितु सामाजिक जीवन भी प्रभावित हो रहा है, ऐसे में जन्म से मृत्यु तक की यात्रा असंतोष व भटकाव से प्रभावित होकर कष्टदायक हो रही है । समाज की प्रगति, शांति एवं समृद्धि के लिए हमें इन दुर्बलता एवं विकृतियों की ओर ध्यान देना पड़ेगा, इस हेतु शिक्षा एक उपयुक्त माध्यम है इसे स्वीकार करते हुए हमारी शिक्षा में मूल्य - शिक्षा का समावेश आवश्यक है ।


वस्तुत: व्यक्ति एवं समाज के निर्माण में शिक्षा का महत्वपूर्ण योगदान है, प्राचीन काल में प्रचलित गुरुकुल - पद्धति ने भारत को अनेक आदर्श प्रदान किए व भारत विश्व - पटल पर एक सभ्य, सुसंस्कृत व अनुकरणीय राष्ट्र के रूप में जाना गया । व्यक्ति का बौद्धिक व चारित्रिक निर्माण उपलब्ध शिक्षा व्यवस्था पर निर्भर करता है ।


शिक्षा में विज्ञान, तकनीकी, गणित, साहित्य,भूगोल इत्यादि नाना - विध विषयों के अतिरिक्त मूल्य आत्मक चेतना का समावेश भी आवश्यक है,  मूलत: किसी वस्तु अथवा विषय की आवश्यकता अथवा महत्व ही मूल्य कहलाता है । मूल्यविहीन शिक्षा - व्यवस्था कई प्रकार की समस्याओं का कारण है । स्वामी विवेकानंद के अनुसार "यदि राष्ट्र शिक्षा से संपन्न होता तो हम पराभूत मन: स्थिति में ना आए होते," अपने देश में शिक्षा के अभाव ने अत्यधिक नुकसान किया है । शिक्षा और विशेषकर मूल्यपरक शिक्षा के अभाव ने भारत में कई समस्याओं को जन्म दिया है ।


वर्तमान शिक्षा - व्यवस्था कौशल प्रदान कर रही है; किंतु उसके कौशल में मानवीयता कि छाया नहीं दिखाई देती । विद्यार्थियों को अपने समाज एवं राष्ट्र और उससे बढ़कर वैश्विक परिदृश्य में एक संवेदनशील राष्ट्रभक्त नागरिक के रूप में विकसित करने की दिशा में वर्तमान शिक्षा प्रणाली विफल रही है, आज का विद्यार्थी के एक जिम्मेदार नागरिक नहीं बन पा रहा है उसकी सोच में समाज व राष्ट्र की सेवा का चिंतन नहीं है । शिक्षित होकर भी उसे अपनी सामाजिक भूमिका का बोध नहीं है सही मायने में उसे शिक्षा का अर्थ ठीक तरह से नहीं समझाया गया है । वर्तमान शिक्षा पद्धति में यह कहीं नहीं सिखाया जा रहा है कि मनुष्य के जीवन- मूल्य क्या है 'समाज प्रकृति के प्रति उसकी जिम्मेदारियां क्या है,' वह एक सुसंस्कृत नागरिक की भांति अपने देश अपने समाज एवं अपने परिवार के प्रति  अपनी जिम्मेदारियां निभा सकता है  ।


मूल्यपरक शिक्षा का आधार धर्म होता है । प्राचीन काल से ही हमारे समाज में धर्म एवं नैतिक शिक्षा पाठ्यक्रम का अनिवार्य भाग थे और न केवल पाठ्यक्रम में अपितु परिवार के समाज में प्राप्त होने वाले संस्कारों में भी धर्म, परंपरा इत्यादि के माध्यम से सत्य, अहिंसा, दया, अस्तेय, अपरिग्रह, धैर्य इत्यादि इत्यादि के प्रति विशेष आग्रह एवम तदनुसार जीवन जीने के बारे में सिखाया जाता था । यह भारतीय संस्कृति ही है जहां पर "सर्वे भवंतु सुखिनः, सर्वे संतु निरामया: । सर्वे भद्राणि पश्यंतु, मां कश्चित् दु:खभाग भवेत् " की प्रेरणा के साथ शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति अपना विकास करता है ।
भारतीय जीवनदर्शन ने ही उद्घोष किया कि "मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, राष्ट्र देवो भव," अर्थात माता-पिता शिक्षक एवं राष्ट्र ने यह सभी देव तुल्य है । इन जीवन मूल्यों का निरूपण बाल्यकाल से ही घर परिवार तथा विद्यालय के माध्यम से इतना सुंदर भाव से विकसित किया है जिसमें न केवल मनुष्य अपितु संपूर्ण जीव जगत के प्रति मानवीय संवेदनाएं विकसित हो । हमारे यहां पर कहा गया है कि "अष्टादशपुराणेषु व्यास्यस वचनधुयम । परोपकार: पुण्याय परपीड़नम" नैतिक मूल्यों के मूल में परोपकार का भाव आवश्यक है । तुलसीदास जी ने कहा है कि "परहित सरिस धर्म नहिं भाई, परपीड़ा सम नहिं अध्माई "!



फायड ने व्यक्ति के समाजीकरण के बारे में कहा है कि व्यक्ति का व्यवहार अचेतन शक्तियों द्वारा संचालित होता है । उसने id, ego तथा super ego  नामक तीन संबोधन दिए जो स्पष्ट रूप से स्पष्ट रूप से बदलाते जाते हैं कि मनुष्य के मन में उसकी अंतरात्मा पर id तथा super ego  के  पारस्परिक संघर्ष का प्रभाव होता है और उसी प्रक्रिया में मनुष्य अपने व्यक्तित्व का व्यक्तित्व का निर्माण करता है । यदि प्रारंभ से ही व्यक्ति के Id, ego, super ego में उसका परिवेश एक संतुलन स्थापित कर सके जो पारस्परिक सहअस्तित्व स्वीकार्यता को पोषण दें तो शेष जीवनमूल्यों का निरूपण उसके व्यक्तित्व में स्वत: होता है  ।


जीवन मूल्यों को किन्ही शाब्दिक परिधि में बांधना असंभव नहीं तो मुश्किल जरूर है कोई मूल्य विशेष परिस्थितियों में स्वीकार्य एवं सकारात्मक माना जा सकता है तो किन्हीं अन्य परिस्थितियों में अवांछित व अग्राहय माना जा सकता है । गहन चिंतन मनन के पश्चात राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद ने उन, मूल्यों की और मूल्यों की  एक सूची तैयार की है जिन्हें हम नैतिक मूल्य कह सकते हैं । इस सूची में 84 मूल्यों को रखा गया है । कोई भी विचारशील व्यक्ति इस बात से  सहमत होगा कि नैतिक गुणों की कोई एक संपूर्ण सूची नहीं बनाई जा सकती है ।


"आदर्श, अनुशासन, मर्यादा, परिश्रम, इमानदारी और उच्च मानवीय मूल्यों के बिना किसी का जीवन महान नहीं बन सकता !"

                                 __ स्वामी विवेकानंद