शिक्षा सभी युगों में आवश्यक और महत्वपूर्ण मानी जाती रही है । यह मानव के सफल जीवन के लिए आवश्यक है । इसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती हैं । किसी भी राष्ट्र की समृद्धि शिक्षा के विस्तार व स्तर से प्रभावित होती हैं । जीवन के सभी क्षेत्रों में प्रगति शिक्षा की गुणवत्ता पर निर्भर करती है ।
आज शिक्षा का अर्थ जानकारियों के संग्रह से लिया जाने लगा है । जिसके पास जितनी अधिक जानकारी है वह उतना ही अधिक पढ़ा लिखा माना जाता है । वह पुस्तकों पत्र-पत्रिकाओं को पड़ता है, उससे कुछ निष्कर्ष भी निकालता है किंतु, वह इतने भर से सत्य - असत्य को समझने की शक्ति अथवा समाज - देश के लिए उपयोगी - अनुपयोगी, मानव कल्याण के लिए सार्थक को आदि को समझने के लिए स्वतंत्र चिंतन क्षमता का विकास नहीं हो पाता है । जो जानकारी या ज्ञान प्राप्त किया है उसका मंथन करते हुए सत्य के रास्ते पर चलने की क्षमता विकसित होना आवश्यक है ।
आधुनिक भारत के निर्माता महात्मा गांधी ने शिक्षा के महत्व का वर्णन करते हुए कहा है कि "शिक्षा का लक्ष्य विद्यार्थी को एक आदर्श नागरिक, देशभक्त तथा परिवार, समाज व राष्ट्र के लिए हीरा (रत्न) बनाना है ।" शिक्षा के द्वारा स्वास्थ्य व समृद्ध समाज के लिए योग्य नागरिकों का निर्माण होना चाहिए । पढ़ा लिखा (शिक्षित) व्यक्ति देशभक्त संवेदनशील व चरित्रवान बने । कुशल, प्रवीण व आत्मविश्वास से युक्त हो । दैनंदिन जीवन में ईमानदार, साहसी, दायित्ववान व प्रमाणिक दिखाई दे । बड़ो तथा नारी के प्रति सम्मान व निश्चल दृष्टि तथा बच्चों के प्रति प्रेम का भाव विकसित हो । उसका जीवन नैतिकता, सहयोग की भावना, कर्तव्यपरायणता व आत्मविश्वास जैसे गुणों की सुगंध से महके । इसलिए स्वामी विवेकानंद ने माना कि शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य की अंतर्निहित ही शक्ति का जागरण है । आत्मा के जागरण द्वारा ही व्यक्ति सार्थक जीवन जीने लायक बनता है । वास्तव में शिक्षा का उद्देश्य इन्हीं मानवीय मूल्यों को व्यक्ति के जीवन में प्रस्फुटित करना है । सामाजिकता, करुणा, मैत्री, दया, विनम्रता, धैर्य, विश्वास, कृतज्ञता, पारदर्शिता, सहयोग, आत्मनिर्भरता जैसे मानवीय मूल्यों द्वारा ही शिक्षा सार्थक हो सकती है । इन गुणों के अभाव में एक सभ्य, उदार, सहअस्तित्व युक्त समाज की कल्पना भी कठिन है । शिक्षा द्वारा ही मानवीय मूल्यों का बीजारोपण संभव है तथा इसके द्वारा ही सभ्य, शांतिप्रिय, सहअसतित्ववादी, समन्वयकारी व उदार समाज जीवन का निर्माण संभव है ।
आजादी के 70 वर्षों में हमारे देश में शिक्षा का तेजी से विस्तार हुआ है (यद्यपि जितना विस्तार होना था वह नहीं हुआ)! शिक्षा के विस्तार के साथ समस्याओं में कमी आनी चाहिए थी, किंतु समस्याएं अधिक गंभीर बनी है ।
शिक्षित व्यक्तियों में से एक वर्ग अपने स्वार्थ के लिए देश समाज के प्रति द्रोह करता दिखाई देता है। समाज का एक समूह जो उच्च शिक्षा प्राप्त हैं देश के विरुद्ध संघर्ष करने वाले आतंकवादियों को न केवल सहयोग करता है, वह आतंकवादियों के समूह में सम्मिलित हो जाता है । देश के विरूद्ध नारा लगाता है । भारत के विभाजन की बात करता है ।
नारी की गरिमा में प्रतिष्ठा के स्थान पर शोषण, अपमान व उसके साथ दुराचार की घटनाएं आए दिन पढ़ने को मिलती है । महिलाओं के साथ बलात्कार व हत्या हो जैसी हृदय विदारक घटनाएं बढ़ रही है ।
भ्रष्टाचार अब शिष्टाचार जैसा समझा जाने लगा है। भ्रष्टाचार व्यक्तियों को उतना उद्वेलित नहीं करता जितना करना चाहिए । लाखों करोड़ों के घोटाले करने वाले अपने को शर्मसार अनुभव नहीं करते । येन केन प्रकारेण धन प्राप्त करने की होड़ दिखाई दे रही है । और जिन्होंने अधर्म पूर्वक धन जमा किया है समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त कर रहे हैं । ईमानदारी के साथ है जीवन जिया जा सकता है, इस पर प्रश्न लगाया जा रहा है ।
पराई स्त्री को माता के समान, दूसरों के धन को मिट्टी के समान, सभी में एक ही आत्मा है इस प्रकार के उच्च आदर्श अपनाने वाले व्यक्तियों को ही पंडित अर्थात् शिक्षित मानव मानने वाला समाज आज किस अवस्था में है इसको समझा जा सकता है ।
यह अवस्था क्यों है ? इसका एक मात्र कारण आज की शिक्षा से व्यक्ति मानव मूल्यों को धारण कर संस्कारित नहीं होता है। वे शिक्षा के मंदिरों से अनुशासनहीनता, बड़ों के प्रति असम्मान, संबंधों में स्वच्छंदता, मर्यादाओं का उल्लंघन, परीक्षा पास करने के लिए अनुचित साधनों का उपयोग आदि दुर्गुणों को सीखता है । जब तक हमारी शिक्षा मनुष्य बनाने की (अर्थात मूल्यों की) शिक्षा नहीं देगी तब तक समस्याए बढ़ती ही रहेगी ।
राम व रावण का उदाहरण हमारे सामने है । राम ने शिक्षा द्वारा अपने को संस्कारित किया, मानवीय मूल्यों को जीवन में अपनाया। इस कारण वे एक आदर्श पुरुष बन सके । जीवन के सभी क्षेत्रों में उन्होंने जो प्रतिमान स्थापित किए उसके कारण आज राम राज्य की स्थापना संभव हो सकी । महात्मा गांधी से एक बार पूछा गया था, आजादी के बाद भारत कैसा होगा तो उन्होंने उत्तर दिया था रामराज्य जैसा होगा । जबकि रावण उच्च कोटि का पंडित होते हुए भी इस तरह का सम्मान प्राप्त नहीं कर सका ।
आशा करता हूं आपको यह पोस्ट पसंद आएगी ।
"चरित्र और शैक्षणिक सुविधाएं ही वह पुंजी है जो माता-पिता अपनी संतान में समान रूप से स्थानांतरित कर सकते हैं ।"
__महात्मा गांधी
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