स्वामी विवेकानंद जी द्वारा लिखा गया सफलता का प्रथम सूत्र।
उठो अर्थात केवल बातें मत करो, केवल विचार की घोषणा मत करो, बल्कि अपने जीवन के लिए श्रेष्ठ सार्थक लक्ष्य को चुनो और कुछ कर्म करने के लिए तैयार हो जाओ। जागो अर्थात् लक्ष्य प्राप्ति के लिए किन प्रयत्नो की आवश्यकता है, कौन सी योजना उपयुक्त होगी, मार्ग में आने वाले अवरोध और उन्हें दूर करने के उपाय क्या रहेंगे, इन सब के प्रति सचेत रहो, चैतन्य रहो। लक्ष्य प्राप्ति तक रुको मत। अर्थात एक बार तय कर लिया , जीवन का सार्थक मार्ग चुन लिया, आगे बढ़ने की योजना बना ली, तो फिर बिना रुके, बिना थके, चाहे कितनी भी बाधाएं आ जाए, सब को पार करते हुए निराशा आलस्य को दूर रखते हुए आगे बढ़े चलो बढ़े चलो, यदि हमने जीवन में इस सूत्र को अपना लिया तो जीवन में सफलता सुनिश्चित ही हैं।
अकर्मण्यता, निराशा ,आलस्य और शिथिलता- यह सभी उद्भव, विकास और उन्नति के सबसे बड़े बाधक तत्व हैं । अनेक लोग बिना कोई कर्म किए बस केवल निरर्थक बोलते रहते हैं। बड़ी-बड़ी बातें, बड़े-बड़े दावे, बड़ी-बड़ी प्रतिज्ञा। केवल प्रतिज्ञा बोल देने से कुछ होने वाला नहीं है। जीवन में सफलता पाने के लिए आवश्यक है सक्रिय कर्म और विचार की क्रियान्वीती।
स्वामी विवेकानंद संपूर्ण विश्व के समक्ष उपनिषद का यह सूत्र प्रतिपादित किया - "उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत" ।। अर्थात उठो जागो । और लक्ष्य प्राप्ति तक रुको मत।। वास्तव में युवा पीढ़ी को अपने जीवन में सफलता के लिए जिस सूत्र की सर्वाधिक आवश्यकता है, वह यही सूत्र है। वरण यह तो जीवन लक्ष्य की प्राप्ति का महामंत्र हैं।
उठो अर्थात केवल बातें मत करो, केवल विचार की घोषणा मत करो, बल्कि अपने जीवन के लिए श्रेष्ठ सार्थक लक्ष्य को चुनो और कुछ कर्म करने के लिए तैयार हो जाओ। जागो अर्थात् लक्ष्य प्राप्ति के लिए किन प्रयत्नो की आवश्यकता है, कौन सी योजना उपयुक्त होगी, मार्ग में आने वाले अवरोध और उन्हें दूर करने के उपाय क्या रहेंगे, इन सब के प्रति सचेत रहो, चैतन्य रहो। लक्ष्य प्राप्ति तक रुको मत। अर्थात एक बार तय कर लिया , जीवन का सार्थक मार्ग चुन लिया, आगे बढ़ने की योजना बना ली, तो फिर बिना रुके, बिना थके, चाहे कितनी भी बाधाएं आ जाए, सब को पार करते हुए निराशा आलस्य को दूर रखते हुए आगे बढ़े चलो बढ़े चलो, यदि हमने जीवन में इस सूत्र को अपना लिया तो जीवन में सफलता सुनिश्चित ही हैं।



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